कविता

पुराने दिनों की यादें…

याद है सड़क पर पैदल चलना

अपनी ही छाँव को देखकर इतराना

कभी कार के शीशों पर झांककर

बालों को सवारना

ऊंची इमारतों को देख सपने बुनना

कंधे पर एक बस्ता होता था

और आँखों में काला चश्मा

इस रुबाब से सड़कों पर निकलते थे

जैसे इस सड़क के बादशाह हों

फिर कोई अनजाना दिख जाता तो

उसे देखकर मुस्करा देते थे,

आज भी मुझे याद है,

वो अपने घर की गली पर मुड़ते ही

एक फलों के रस की दूकान थी

हम अक्सर वहां जाया करते थे,

दोस्तों को लाया करते थे

उन कॉलेज के दिनों में अक्सर

दिन में पढाई की बातें

और रात में दिल की बातें करते थे

घंटों बातें करते थे,

मुझे तो अब भी याद है

उन पेड़ों की परछाइयां जो छाँव देती थीं

उन टूटी दीवारों की उधड़ी हुयी ईंटें

जिनपर अक्सर चढ़ कर बैठ जाते थे,

सूरज का ढलना,

चाँद का निकलना

सब याद है,

बस गिला यही है

कि ये यादें हैं, हासिल कुछ भी नही!

 

___सौरभ कुमार

सौरभ कुमार दुबे

सह सम्पादक- जय विजय!!! मैं, स्वयं का परिचय कैसे दूँ? संसार में स्वयं को जान लेना ही जीवन की सबसे बड़ी क्रांति है, किन्तु भौतिक जगत में मुझे सौरभ कुमार दुबे के नाम से जाना जाता है, कवितायें लिखता हूँ, बचपन की खट्टी मीठी यादों के साथ शब्दों का सफ़र शुरू हुआ जो अबतक निरंतर जारी है, भावना के आँचल में संवेदना की ठंडी हवाओं के बीच शब्दों के पंखों को समेटे से कविता के घोसले में रहना मेरे लिए स्वार्गिक आनंद है, जय विजय पत्रिका वह घरौंदा है जिसने मुझ जैसे चूजे को एक आयाम दिया, लोगों से जुड़ने का, जीवन को और गहराई से समझने का, न केवल साहित्य बल्कि जीवन के हर पहलु पर अपार कोष है जय विजय पत्रिका! मैं एल एल बी का छात्र हूँ, वक्ता हूँ, वाद विवाद प्रतियोगिताओं में स्वयम को परख चुका हूँ, राजनीति विज्ञान की भी पढाई कर रहा हूँ, इसके अतिरिक्त योग पर शोध कर एक "सरल योग दिनचर्या" ई बुक का विमोचन करवा चुका हूँ, साथ ही साथ मेरा ई बुक कविता संग्रह "कांपते अक्षर" भी वर्ष २०१३ में आ चुका है! इसके अतिरिक्त एक शून्य हूँ, शून्य के ही ध्यान में लगा हुआ, रमा हुआ और जीवन के अनुभवों को शब्दों में समेटने का साहस करता मैं... सौरभ कुमार!

3 thoughts on “पुराने दिनों की यादें…

  • इन यादों में कुछ मज़े हैं जो सिर्फ अपने ही होते हैं .

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छी कविता !

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