संस्मरण

मेरी कहानी- 24

आज पर्यावरण के बारे में भारत में जागरूकता पैदा हो रही है जो बहुत अच्छी बात है। वृक्ष लग रहे हैं, बच्चों को वृक्ष लगाने को उत्साहित किया जा रहा है। वृक्षों के बगैर हमारी ज़िंदगी बेस्वाद है. जब मैं छोटा था तो वृक्ष इतने थे कि जैसे गाँव एक जंगल के बीच बसें हों। सब से ज़्यादा कीकर (बबूल) के वृक्ष होते थे और दूसरे नंबर पर होते थे प्लास या छिछरों, और टाहली के वृक्ष। आज जो हमारा गाँव है उस वक्त इस से आधा होता था। बहुत से लोगों के घरों में भी नीम के वृक्ष होते थे। कोई पर्यावरण की बात नहीं होती थी, लोग खुद ही इतने वृक्ष लगाते थे कि किसी को कहने की जरुरत ही नहीं होती थी। एक नीम जैसा ही वृक्ष होता था जिसे डेक (नीम चमेली) कहते थे और उस को छोटे छोटे बेरों जैसे डकानू लगते थे। यह बहुत कड़वे होते थे। नीम और डेक के पत्ते बहुत काम आते थे। यह बहुत सी बीमारिओं में काम आते थे। मेरे बड़े भाई हिकमत में दिलचस्पी रखते थे । जब भी वोह अफ्रीका से वापिस आते, हमेशा नीम के पत्तों को तवे पर भून कर, उस में थोड़ी शक्कर डाल कर खाया करते थे। कभी कभी तो वोह नीम के पत्तों को पीस कर उन का कड़वा रस भी पीते थे जिस को वे कड़वा घूँट कहते थे । एक दफा उन्होंने मुझे भी दिया था लेकिन मैंने उसी वक्त थूक दिया था, क्योंकि वोह ज़हर जैसा कड़वा था। बड़े भाई हम सब से बड़े थे लेकिन उन की सिहत भी सब से अच्छी थी, और हम से जवान लगते थे। वोह टूथ पेस्ट कभी इस्तेमाल नहीं करते थे, सिर्फ जंगल पानी जा कर आते समय कीकर की टहनी तोड़ कर चाकू से दातुन बना लेते और खूब आधा घंटा दातुन करते। फिर दातुन को बीच में से दो हिस्सों में फाड़ कर उस से जीभ को साफ़ करते थे। उस के बाद कुएं के चलहे में बैठ कर नहाते थे और पाठ शुरू कर देते थे।

जगह जगह खेतों में कुएं होते थे और हर कुएं पर बहुत वृक्ष हुआ करते थे जो बहुत बड़े बड़े होते थे क्योंकि इन को कोई काटता नहीं था। एक दो आम और जामुन के इलावा शहतूत और टाहली के वृक्ष भी होते थे। शहतूत के वृक्षों से टोकरे बनाये जाते थे जो बहुत काम आते थे। कही कहीं पीपल और बोहड़ के वृक्ष भी होते थे जिन की छाँव के नीचे या तो पशु बांधे हुए होते थे या गर्मिओं के दिनों में चारपाईओं पर लोग लेटे हुए होते थे। कूंआं चलने से टिक टिक की आवाज़ आती रहती थी। कहने की बात नहीं यह बहुत सुहावना दृश्य होता था। आज राणी पर से फगवारे जाने वाली पक्की सड़क की दोनों तरफ कोई बृष नहीं है और यही दृश्य राणी पर से जानी वाली चार अन्य सड़कों का है जो बहुत दुर्भागिया पूर्ण है. मेरे ज़माने में गाँव के जितने भी रास्ते बाहर को जाते थे उन की दोनों साइड पर ऊंचे ऊंचे बाँध होते थे और उन पर कई तरह की झाड़ीआं और कैक्टस हुआ करते थे और कई लसुडिओं (लिसोड़े) के वृक्ष होते थे।

हमारी गली की कुछ ही दूरी पर से वृक्ष शुरू हो जाते थे। मेरे दोस्त बहादर सिंह के खेतों की दूसरी ओर बहादर की तकरीबन सौ बेरीआं होती थीं जिन पर बेरिओं के मौसम में बहुत बेर लगते थे। हम बहुत से लड़के इकठे हो कर बेर खाने जाते थे। बेर इतने होते थे की हमें खाने के लिए कोई कोशिश ही नहीं करनी पड़ती थी, नीचे ही इतने गिरे होते थे कि ऊपर से झाड़ने की जरुरत ही नहीं पड़ती थी। इन बेरीओं के नज़दीक ही एक कुँआ होता था, इसी लिए इस को बेरीओं वाला कुँआ कहते थे। इन बेरिओं के कुछ ही दूर बहादर का ही बाग़ वाला कुँआ था। इस को बाग़ वाला कूंआं इस लिए कहते थे क्योंकि इस के नज़दीक बहुत बड़े बड़े जामुन, सफ़ैदे और आम के वृक्ष होते थे। यह भी कोई सौ के करीब ही होंगे। हम इन वृक्षों पर चढ़ जाते और जी भर कर आम और जामुन खाते। यह सारा इन वृक्षों का फ्रूट वैसे ही बर्बाद हो जाता था क्योंकि इन लोगों को परवाह ही नहीं थी। इस बाग़ में मज़े करने के बाद हम आगे चले जाते यहाँ बहुत घने वृक्ष होते थे, जिन पर हम जंग पलंगा खेलने लगते। कभी कभी हम इस से भी आगे नदी तक पौहंच जाते जिस के किनारे पर भी बहुत वृक्ष होते थे। इस नदी पर भी बहादर की ज़मीन होती थी और इस पर एक ख़ास किस्म के वृक्ष होते थे जो और कहीं नहीं थे, इन को सूकना और यूक्लिप्स्टिक के वृक्ष कहते थे। नदी में कभी कभी हम नहाने भी लगते। इस नदी में रेत बहुत होती थी। जिस को भी मकान बनाते समय रेत की जरुरत होती वोह यहां से छकड़ा भर कर ले जाता, कोई नहीं पूछता था। कुछ अरसा पहले जब मैं इंडिया में था तो सुन कर बहुत हैरानी हुई कि अब इस रेत को हकूमत ठेके पे देती है और रेत की कीमत सुन कर ही हैरान हो गिया कि यह रेत जो कभी सब के लिए मुफत थी अब बहुत महँघी विक रही थी।

बहुत लोग वृक्ष बीजते थे। मेरे दादा जी यहाँ भी नए वृक्ष लगाने हों वहां बहुत से तीन चार फ़ीट ज़मीन के नीचे तक गड़े खोद देते थे। कई महीने वोह गड़े इसी तरह पड़े रहते। उन में बारिश का पानी भर जाता, सूख जाता, फिर भर जाता होता रहता था। ज़्यादा वोह कीकर के वृक्ष लगाते थे। जब बीज बीजने हों तो कीकर के बीज जो फलिओं में होते थे, हल्का सा डंडे से फ़लिओं को तोड़ देते। फिर उन गढ़ों को उसी मट्टी से भर देते और ऊपर बीज फैंक देते। बारिश पड़ने पर वोह बीज पुंगरने लगते और छोटे छोटे बूटे बन कर जल्दी ही वृक्ष बनने लगते। इसी तरह पलाश यानी छिश्रों के बीज फैंक देते। इस तरह नए नए वृक्ष लगते रहते। बीच बीच पुराने बड़े हुए वृक्षों को काट कर, उन को बड़ी बड़ी आरिओं से चीर कर काम में लाते। लकड़ीआं इतनी होती थीं कि चूल्हे में काम तो आती ही थीं, बहुत सी लकड़ियों को शहर में बेच आते थे क्योंकि उस समय शहर में भी लकड़ीआं या कोले चूल्हे के लिए काम आते थे। शहर में लकड़ीआं बेचने वाले विओपारी होते थे। ईंधन के लिए बहुत बड़े बड़े लकड़ियों के टाल होते थे और बहुत बड़ी तकड़ी होती थी जिस को तकड बोलते थे। उस से लकड़ीआं तौल कर बेचीं जाती थीं।

गाँव की दूसरी तरफ भी दूर दूर तक दरख्त ही दरख्त दिखाई देते थे। कीकर के वृक्षिों पर गोंद बहुत लगता था। हम बंदरों की तरह ऊपर चढ़ जाते और गोंद तोड़ कर जेबों में डालते रहते। जल्दी ही जेब भर जाती। वृक्ष ज़्यादा होने के कारण परिंदे भी तरह तरह के होते थे। भिन्न भिन्न आवाज़ें आती रहती थी। कउए सब से ज़्यादा होते थे। जब शाम होती तो लाखों की तादाद में कउए शाम के समय कां काँ करते जाते। आमों के वृक्षों पर तोते ही इतने होते थे कि आम लगने के वक्त आमों की रखवाली करनी पड़ती थी क्योंकि तोते आमों की कच्ची अमीआं टुकर टुकर खाते और तोड़ते रहते। कहते हैं कि यह परिंदे हमरी ज़िंदगी में बहुत जरूरी हैं। इस के बगैर जीवन अधूरा है। यह बहुत सही बात है। जितने परिंदे उस वक्त थे अब तो दीखते ही नहीं। और सब से अहम बात जो है वोह है शुद्ध वातावरण। जितने ज़्यादा वृक्ष होंगे उतनी ही वोह ऑक्सीज़न छोड़ेंगे। और बारिश होगी जो हमारे लिए जरूरी है। मुझे याद है हमारे गाँव से कुछ दूरी पर नदी है जिस में पानी बहुत होता था और इस को पार करने लिए बेड़ी (कश्ती ) होती थी। और जब यह नदी भरी होती थी तो हम कैद हो कर रह जाते थे क्योंकि नदी में पानी इतना होता था कि बहुत दिनों तक गाँव से बाहिर जाया नहीं जा सकता था। अब यह नदी सूखी पड़ी है और लगता ही नहीं कि यहां नदी है।

बारशों की वजह से धरती में पानी बहुत होता था। जितने भी कुएं थे उनमें तीस पैंतीस फ़ीट पर ही पानी आ जाता था और हम उस में नीचे जा कर नहा भी लेते थे। हमारी राम सर वाली जमींन तो नदी से कुछ ही गज़ की दूरी पर थी और इसी लिए इस कुएं में पानी इतना ऊपर था कि मुश्किल से बीस फ़ीट नीचे ही था। अब तो कुएं लग ही नहीं सकते क्योंकि पानी इतना नीचे चले गिया है कि पानी तक पौहंचा ही नहीं जा सकता। ट्यूब वैलों से पानी खींच खींच कर जो हालत पंजाब की हो रही है कि लगता है एक दिन ऐसा आएगा कि पंजाब रेगिस्तान बन जाएगा क्योंकि जो अब ट्यूब वैल के बोर हो रहे हैं उन को बहुत नीचे तक जाना पड़ता है। पानी की ऊपरली सतह खत्म हो गई है। पीने के पानी के लिए तो बहुत गैहराई तक जाना पड़ रहा है जो चिंता का विषय है. गाँव के पूर्व की और कुछ मील दूरी पर रामगढ़ और खाटी के नज़दीक तो इतने वृक्ष थे कि दूर दूर तक देखना ही मुश्किल था। कभी कभी हमारे स्कूल का फ़ुटबाल मैच रामगढ़ के स्कूल से होता था और इस फ़ुटबाल ग्राउंड की एक तरफ पलाश के वृक्षों का घना जंगल सा होता था। इन वृक्षों के बीच एक सुरंग होती थी जो शायद बाढ़ के पानी से बचाने के लिए होती थी। अक्सर हम इस सुरंग के बीच दाखिल हो जाते थे। यह सुरंग मुश्किल से तीन फ़ीट ऊंची थी और हम रेंग रेंगकर इस में चलते थे।

उत्तर की और भी कीकर के वृक्ष बहुत होते थे। मेरे ननिहाल आदम पुर के नज़दीक हैं (यह मिलिटरी की छावनी है )और हमें इन कीकर के वृक्षों के बीच जाना पड़ता था। यह एक सुनसान जंगल ही लगता था। मेरी यह किश्त सिर्फ यह लिखने के लिए है कि उस समय कितने वृक्ष होते थे जो अब नहीं हैं और उन की जगह खेत ही खेत हैं। यह पेह्चान्ना ही मुश्किल है कि वहां किया होता था। इस के इलावा घास के मैदान भी गाँव के चारों ओर थे और इन मैदानों में होते थे बड़े बड़े तालाब जिस में भैंसें तैरती रहती थी और सारा दिन वहीँ से पानी भी पीती रहती।
सोचता हूँ आज़ादी के वक्त भारत की आबादी ३६ करोड़ थी जो अब १२५ करोड़ है। पानी कितना हम पी रहे हैं और इतने ही लोग नहा रहे है, उतने ही लोगों के कपडे धोने पड़ते हैं। पहले कारें मोटर बाइक न के बराबर थे, अब घर घर कमज़कम मोटर बाइक तो है ही, इन के रेडिएटरों में भी पानी डालना पड़ता है और उन्हें धोना भी पड़ता है, फिर कितनी फैक्ट्रियां भी लग चुक्की हैं और लग रही हैं, पहले गाए भैंसे तालाबों में से पानी पी लेती थी जो अब नल का पानी पीती हैं। धरती का पानी हमेशा तो मिलना संभव नहीं है। यह जो पर्यावरण का हम सत्यानाश कर रहे हैं, अगर हम सम्भले नहीं तो एक दिन हमें पछताना पड़ेगा।

इस के इलावा जो सब से खतरनाक बात हो रही है, वोह है ज़हरीली फ़िज़ा और ज़हरीली धरती। हम खेतों में इतने ज़हरीले स्प्रे और कीट नाशक दुआईआं छिड़क रहे हैं कि कैंसर जैसे रोग अब आम बात हो गई है। बहुत किसान यह दुआइआं छिड़कते ही अपनी जान से हाथ धो चुक्के हैं, ऐसा मैंने बहुत पड़ा है। कारों ट्रक्कों और मोटर बाइकों का ज़हरीला धुँआ इतना बड़ चुक्का है कि हर वक्त ज़हरीले सांस ले रहे हैं। इस से भी ज़्यादा धुँआ फैक्ट्रियों की चिमणिओं से आता है। फैक्ट्रियों का वेस्ट दरिआओं में डाल रहे हैं। जब गंगा जैसी पवितर नदी भी बच नहीं पाई तो दूसरी नदिओं का तो सोचना भी बेकार है। सोचता हूँ कैसी उनती है यह। मेरे बचपन के समय ना कोई दुआई होती थी, न यूरीआ और दुसरी खादें, होता था तो सिर्फ पशुओं का वेस्ट जो बिलकुल प्योर और धरती के लिए उत्तम। ज़्यादा से ज़्यादा प्याज़ के बूटों पर घर के चूल्हे की राख डाल देते थे। कीड़े मकौड़े होते ही नहीं थे, सिर्फ एक दफा टिड्डी ही आई थी, उस में भी खेतों में कुछ नहीं डाला गिया था। सब कुछ ऑर्गैनिक ही होता था। अब नए नए कीड़ों के नाम सुनने को मिल रहे हैं।तब फसलें बहुत होती थीं, अब ज़्यादा से ज़्यादा खादें डाल डाल कर धरती माँ को ज़्यादा से ज़्यादा उगाने पर जोर दे रहे हैं। लगता है, धरती माँ भी एक दिन हाथ खड़े कर देगी।

और आखिर में यह भी लिखना चाहूंगा कि नॉएज पौलूशन (शोर प्रदूषण) भी इतना बड़ गया है कि जब हम भारत आते हैं तो हमें लगता है कि यह किया हो रहा है। मैं जानता हूँ कि भारत में रहते लोग इस शोर के आदि हो चुक्के हैं लेकिन यह सिहत के लिए अच्छा नहीं है। मोदी जी ने जो स्वश्ता अभियान शुरू किया है वोह बहुत ही ऊंची सोच है। काश सभी भारतीय इस को विचार करें और हर तरह का पौलिूशन खत्म करने की कोशिश करके और ज़्यादा से ज़्यादा वृक्ष लगा कर पर्यावरण को इतना शुद्ध करें कि हम कह सकें कि हमारा भारत वर्ष महान है।

(चलता….)

7 thoughts on “मेरी कहानी- 24

  • ये कुछ चुनिन्दा पंक्तियाँ हैं जो सार्थक सन्देश देती हैं
    “पहले कारें मोटर बाइक न के बराबर थे, अब घर घर कमज़कम मोटर बाइक तो है ही, इन के रेडिएटरों में भी पानी डालना पड़ता है और उन्हें धोना भी पड़ता है, फिर कितनी फैक्ट्रियां भी लग चुक्की हैं और लग रही हैं, पहले गाए भैंसे तालाबों में से पानी पी लेती थी जो अब नल का पानी पीती हैं। धरती का पानी हमेशा तो मिलना संभव नहीं है। यह जो पर्यावरण का हम सत्यानाश कर रहे हैं, अगर हम सम्भले नहीं तो एक दिन हमें पछताना पड़ेगा।”

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      सौरव जी , धन्यावाद , इस के बारे में हमें विचार करना चाहिए .

  • Man Mohan Kumar Arya

    नमस्ते महोदय जी. आज का लेख पर्यावरण संरक्षण व उसके महत्व का प्रभावशाली चित्रण करता है। लेख के लिए बधाई एवं धन्यवाद। वैदिक जीवन पद्धत्ति पर्यावरण प्रेमी रही है। इसी कारण सृष्टि को बने २ अरब वर्ष बीत जाने पर भी सृष्टि में प्राकृतिक श्रोत विद्यमान हैं। आज कल जिस प्रकार से प्राकृतिक साधनो का दोहन हो रहा है उससे मनुष्य जाति पर भयंकर संकट भविष्य में आने का अनुमान होता है। यज्ञ करने से पर्यावरण संरक्षित रहता है। मुझे लगता है कि जब से हमने यज्ञ करना छोड़ा तब से पर्यावरण बिगड़ना शुरू हुवा और आज की स्थिति आयी है। पर्यावरण में पशु पक्षी वा किट पतंग आदि भी आते हैं। पशुवों की हत्या, मांसाहार आदि जीवन शैली भी घोर पर्यावरण विरोधी हैं। मुझे लगता है कि मांसाहार का अवगुण हमें विदशियों के संसर्ग से मिला है। यदि पशु होते तो हमें चारागाह और जंगल रखने होते। पर्यावरण सुरक्षित रहता। अब पशुओं को मार कर खाते हैं, जिससे चारागाह और जंगल ख़त्म हो रहे हैं। आज का मनुष्य मानव न होकर दानवों के काम करके अमानव बन गया है। यह आज के पर्यावरण प्रदुषण का एक कारण होने के साथ भूकम्प आदि का कारण भी बना है। आज के प्रशंसनीय लेख के धन्यवाद आदरणीय श्री गुरमेल सिंह ही।

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      मनमोहन जी , मुझे बहुत दुःख होता है , जो पंजाब की हालात है , है तो सारे भारत में ऐसा ही लेकिन पंजाब को इस लिए लिख रहा हूँ किओंकि मैंने देखा है . सब से पहले तो पानी ही ज़हरीला है . यह जो ज़हर हम धरती माँ के मुंह में डाल रहे हैं किया यह हमें आशीर्वाद देगी ? माँ हमें दूध पिला कर बड़ा करती है , जब माँ को हम ज़हर दे रहे हैं तो उन के दूध में भी ज़हर ही तो होगा . उन्ती के नाम पर हम सिऊसाइद कर रहे हैं . अब जरुरत है , come back to basic.

  • विजय कुमार सिंघल

    भाई साहब, यह क़िस्त पढ़कर लगा जैसे अपने गाँव की कहानी ही पढ़ रहा हूँ. कभी हमारे गाँव में भी बहुत वृक्ष हुआ करते थे. अब उनकी संख्या भी बहुत कम रह गयी है. रासायनिक खादों में पृथ्वी को बंजर सा बना दिया है. मेरा चचेरा भाई पिछले महीने मिला था, बता रहा था कि अब हमारे खेत अन्न उपजाने लायक नहीं रह गए हैं. कुछ खास तरह की फसल ही उनमें हो सकती है. हालत दिन पर दिन ख़राब हो रही है. भगवान् जाने क्या होगा.
    पर्यावरण को हमने ही प्रदूषित किया है और हमें ही उसका परिणाम भोगना पड़ेगा. प्रकृति माता अपने साथ हुए अन्याय का बदला जरूर लेगी.

    • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

      विजय भाई , पंजाब का पानी इतना नीचे चले गिया कि टिऊब वैल लगाना भी आज कल बहुत मह्न्घा पड़ता है . कई जगह तो बोर करना ही मुश्किल हो गिया है . पंजाब में तो कहीं और पानी भी नहीं है सिवाए सतलुज बिआस से और यह पानी तो कुछ भी नहीं है . इस से भी चिंताजनक बात है आबादी का बढना और पानी की कम्ज़म्प्शन जो कई गुना बड चुक्की है , भगवान् जाने किया होगा .

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