लघुकथा

एक मोबाइल कथा

भाई साहब आज कल बहुत खुश थे। कारण कि, वे भी अब मोबाइल धारकों की जमात में शामिल हो गये थे जो तोहफा उनके बेटे ने उनकी  पचपनवीं सालगिरह पर उन्हें भेंट किया था। ऐसा नहीं था कि वे खुद नहीं खरीद सकते थे। सेवा-पानी को भी यदि टैक्सेबिल इनकम में जोड़ दिया जाय तो पैंतालीस-पचास हजार महीने के तो गिरा ही लेते थे। संशय अगर था तो ये कि मोबाइल खरिदने की प्रक्रिया उन्हें नहीं आती थी। वे उसे अपने लैण्ड लाइन फोन लगवाने के अनुभव के आधार पर ही तोलते थे इसीलिये उस पचड़े में पड़ने से घबराते रहे थे।

इस बार जब वे घर आए थे तो सारे मोहल्ले को उनके ‘मोबाइल वाला’ होने का पता चल गया था। क्योंकि, वे जब भी घर से बाहर निकलते,  पालतू कुत्ते की तरह अपने मोबाइल को भी टहला कर लाते ।  भाई साहब जिससे भी मिलते उनका हाथ मोबाइल को इस प्रकार पकड़े रहता कि वो नजर आता रहे। अगर वो व्यक्ति देखने से चूक जाता तो वे मोबाइल को एक दो बार कान पर इस तरह लगाते, मानो ‘डायल टोन’ चेक कर रहे हों। हैरत तो यह थी कि कुछ लोगों ने उन्हें बात भी करते देखा था । अब यह बात तो बिरले ही जानते थे कि आस पास कोई टावर न होने से मोबाइल की अहमियत एक चुनौटी से ज्यादा नहीं रह गयी थी और उपयोगिता तो उससे भी कम थी।  मोबाइल की टार्च आदि से वे अपने कई भक्तों को, जिनकी संख्या में भी इधर अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हो गयी थी, चमत्कृत कर चुके थे।

पाठकों को यह सब पढ़ कर अजीब लग सकता है, पर कोई पन्द्रह साल पहले स्थितियाँ ऐसी ही कुछ हास्यप्रद हुआ करती थीं। उन दिनों किसी के पास मोबाइल होना आज बीस लाख की गाड़ी होने के बराबर था। उस दिन मैं लखनऊ में भाई साहब के घर आया हुआ था। हम बाहर बराम्दे में बैठे भाभीजी की पकौड़ियों का इंतज़ार कर रहे थे और भाई साहब का मोबाइल उनके कमीज़ की उपरी जेब से झाँक रहा था। जाने क्यों मुझे प्रतीत हो रहा था कि कमीज़ की जेब जानबूझ कर औसत से छोटी बनवाई गयी थी ताकि मोबाइल की नाक जेब से बाहर ठीक से साँस लेती रहे।

हम इधर उधर की बातों मे मशगूल थे जब फोन की घंटी बज उठी। भाई साहब ने चेहरे पर रईसी का खास निर्विकार भाव ओढ़ते हुए बड़ी अदा से जेब से मोबाइल को निकाला, उपर चमकते नम्बर पर नज़र डाली और कान से ऐसे लगाया जैसे कोई बरसों का बिछड़ा अपने को गले से लगाता है। परन्तु तब तक फोन बंद हो गया।

“अब देखो कैसे हम उसी नम्बर को काॅल बैक करते हैं,” कहते हुए भाई साहब ने रीडायल कर दिया ।

“हैलो, कौन ?” उधर की आवाज़ सुनना मेरे बस का नहीं था । भाई साहब के बोल से  मैं उधर के शब्दों पर अटकलें ही लगा सकता था।

“अरे ! आपका फोन आया था इसलिए किया”।

“कौन मिसरा?”

“अरे आप बताइये ना, की किस मिसरा को आपने मिलाया है!”

“भाई, बड़े विचित्र आदमी हैं आप! ऐं! फोनवा आप मिलाएँ हैं और हम से पूछ रहें हैं कि हम कौन हैं?”

“उलटवासी तो आप कर रहे हैं ! अपना नाम, प्रयोजन बताते नहीं और हमारा परिचय माँगे जा रहे हैं,” भाई साहब के स्वर में अब तलखी झलकने लगी । एक बार को मैंने चाहा कि कह दूँ कि राँग नम्बर होगा काट दीजिए पर, जिस प्रकार भाई साहब और उनके अपरिचित काॅलर एक दूसरे का परिचय प्राप्त करने पर कटिबद्ध थे, मैंने मौन रहना ही उचित समझा। उधर आपसी परिचय में काफी गरमाहट आ चली थी।

“एक दम बुड़बकै हो का ! इत्ती देर से पूछ रहें हैं कि कहाँ मिलाए हो तौ ऊ तौ नहीं बताते, उल्टे हमारा अता पता पूछे जा रहे हो? जब तुमको यही नहीं मालूम है कि कहाँ बात करनी है तौ का हमै ई जताने के लिये मिलए थे कि तुम्हारे पास भी मोबाइल है ? ऐं !”

“और क्या ! मोबाइल पर बात करने की तमीज़ है नहीं और खरीद लिया दिखाने के लिये !”

“हम काहे रखैं ? तुम रखौ अपना मोबाइल ?” चला है हमको आदेश देने, कहते हुए भाई साहब ने हमारी तरफ एक विजयी नज़र फेंकी। मुझे लगा कि अब शायद उन पकौड़ियों का नम्बर आ जाय जो मेज पर रखी रखी ठंडी हो रही थीं, पर ऐसे मेरे नसीब कहाँ ।

“हमारी मर्जी ! हमारा फोन है, रखें न रखें ! तुम कौन होते हो हमै कहने वाले ! तुम मिलाए हो, तुम रखौ ?”

“अबे, तुम रखौ ! रख ! ससुर दिमाग चाट गया ।”

“रखते हो या वहीं आय कै तुम्हें लतियावैं ?” कहते हुए भाई साहब ने फोन के स्पीकर पर हाथ रखते हुए बड़ी भेद भरी नज़र से मेरी ओर देखा और बोले, “इसमें कहाँ से बोल रहे हो कभी पता ही नहीं चल सकता”। मैं समझ गया कि वे इस सुविधा का फायदा उठा रहे थे। उधर, परिचय का दर्जा भी अब हद्द पार करने पर आमादा था।

मुझे यकीन हो गया था कि अगर ये प्रेम भाव कुछ और बढ़ा तो शामत मोबाइल पर ही आने वाली थी। मैं सशंकित बैठा आने वाले सीन को सोच ही रहा था कि तभी भाभीजी आ गईं । भाई साहब के हाथ से मोबाइल छीन कर बंद किया और चाय को पानी करने के लिये डाँट  लगायी । मैंने अपनी हँसी छिपाने की बहुत कोशिश की पर भाभीजी की नज़र से न बच सका।

“आप नहीं जानते भाई साहब ! ई फोन क्या हाथ में आय गया है, रोज ही किसी न किसी को लतियाते रहते हैं। सचाई तो ये है कि इनके किसी जानकार के पास तो फोन है नहीं तो ऐसे ही गरियाते-लतियाते अपना बैलेंस पूरा किये रहते हैं,” कहते हुए वे अंदर चली गयीं। भाई साहब के लहजे से  स्पष्ट था कि उन्हें ये जबरन का सीज़ फायर पसंद नहीं आया था, पर, हर समझदार पति की तरह उन्होंने भी बात को वहीं रफा दफा किया और पकौड़ी की प्लेट पर इनायत भरी नज़र डाली।

“नहीं ! इन बदतमीजों को सबक सिखाना ही पड़ता है। यूज़ करने की तमीज है नहीं जाहिलों को, मगर मोबाइल जरूर रखेंगे । हमारे देश की यही विडम्बना है कि लोग अपनी औकात से आगे बढ़ कर दिखावा करते हैं। हैं तो वही ना ! अंगरेजों के शब्दों में ‘ब्लडी ब्लैक इण्डियन !” उन्होंने चाय का कप उठाते हुए अपने कृत्य का औचित्य समझाया। और मैं इस अजीबो-गरीब टाइम पास के तरीके पर विचार करने लगा।

मनोज पाण्डेय 'होश'

फैजाबाद में जन्मे । पढ़ाई आदि के लिये कानपुर तक दौड़ लगायी। एक 'ऐं वैं' की डिग्री अर्थ शास्त्र में और एक बचकानी डिग्री विधि में बमुश्किल हासिल की। पहले रक्षा मंत्रालय और फिर पंजाब नैशनल बैंक में अपने उच्चाधिकारियों को दुःखी करने के बाद 'साठा तो पाठा' की कहावत चरितार्थ करते हुए जब जरा चाकरी का सलीका आया तो निकाल बाहर कर दिये गये, अर्थात सेवा से बइज़्ज़त बरी कर दिये गये। अभिव्यक्ति के नित नये प्रयोग करना अपना शौक है जिसके चलते 'अंट-शंट' लेखन में महारत प्राप्त कर सका हूँ।

3 thoughts on “एक मोबाइल कथा

  • Manoj Pandey

    आप सब को अच्छा लगा, हमारी मेहनत सफल हुई। धन्यवाद ।

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बहुत बढिया .

  • विजय कुमार सिंघल

    हा…हा…हा… मजेदार हास्य !

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