लघुकथा

खुशबू चंदन की

“अरे ये किताब !!!ये मेरी कहानी संग्रह आपके हाथ!! आज कैसे मुझे पढ़ने की इच्छा हुई !!”
“तुम्हें तो कब से पढ़ रहा हूँ पर जान ही न पाया कि तुम छुपी रुस्तम भी हो |
क्या लिखती हो !! आज पता चला। और एक कहानी पढ़ तो हंसी ही न रुक रही।”
“कौन सी कहानी पढ़ आप खिलखिला पड़े जनाब?”
“अरे ये वाली ‘जाहिल पिया ‘!! कहीं इस कहानी के जरिये मुझ पर तो गुबार नहीं निकाली |”
“ह्ह्ह्ह तुम भी न । सब मर्द एक जैसे ही होते हो, शंकालु।सब इमेजिनेशन हैं| सच्चाई तो एकाक पर्सेंट होगी, समझे बुढऊ।” दोनों ही उन्मुक्त हंसी हंसने लगे
“एक बात पुछूं?”
“हा हा पूछो जी, आपको कब से इजाजत लेने की जरूरत पड़ने लगी। ”
“मेरी हर आवाज पर तुम सामने होती थी। बच्चों को भी कभी भी अकेले एक पल नहीं रहने दी। फिर ये कहानी के लिये समय कब निकाल लेती थी तुम।”
“काम तो हाथ करते थे न,दिमाक तो कहानी संग्रह करता था। ”
“तुम्हारी कहानी की तरह तुम्हारे जबाब भी लाजबाब हैं ।”
हुँह!!” चलो अब खाना खा लो बहुत तारीफ़ हो गयी। ”
“हा चलो खा ही लू नहीं तो ‘ भूखा पति ‘ कहानी लिख दोगी।” फिर से ठहाका गूंज उठा कमरे में। ..सविता मिश्रा

*सविता मिश्रा

श्रीमती हीरा देवी और पिता श्री शेषमणि तिवारी की चार बेटो में अकेली बिटिया हैं हम | पिता की पुलिस की नौकरी के कारन बंजारों की तरह भटकना पड़ा | अंत में इलाहाबाद में स्थायी निवास बना | अब वर्तमान में आगरा में अपना पड़ाव हैं क्योकि पति देवेन्द्र नाथ मिश्र भी उसी विभाग से सम्बध्द हैं | हम साधारण गृहणी हैं जो मन में भाव घुमड़ते है उन्हें कलम बद्द्ध कर लेते है| क्योकि वह विचार जब तक बोले, लिखे ना दिमाग में उथलपुथल मचाते रहते हैं | बस कह लीजिये लिखना हमारा शौक है| जहाँ तक याद है कक्षा ६-७ से लिखना आरम्भ हुआ ...पर शादी के बाद पति के कहने पर सारे ढूढ कर एक डायरी में लिखे | बीच में दस साल लगभग लिखना छोड़ भी दिए थे क्योकि बच्चे और पति में ही समय खो सा गया था | पहली कविता पति जहाँ नौकरी करते थे वहीं की पत्रिका में छपी| छपने पर लगा सच में कलम चलती है तो थोड़ा और लिखने के प्रति सचेत हो गये थे| दूबारा लेखनी पकड़ने में सबसे बड़ा योगदान फेसबुक का हैं| फिर यहाँ कई पत्रिका -बेब पत्रिका अंजुम, करुणावती, युवा सुघोष, इण्डिया हेल्पलाइन, मनमीत, रचनाकार और अवधि समाचार में छपा....|

One thought on “खुशबू चंदन की

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    सविता जी , कहानी बहुत ही अच्छी लगी . ऐसे पती पत्नी हों तो जिंदगी में कभी मुश्कलें नहीं डरातीं. हम दोनों भी ऐसे ही रहे हैं ,जिस के कारण जिंदगी की मुश्कलें लगी ही नहीं कि कौन सी मुश्किल ,मुश्किल थी .और हमारे बच्चों ने भी यही राह अपनाई है .

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