लेख

हिन्दू आतंकवाद का विश्लेषण

भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र है। और एक गणतांत्रिक राष्ट्र के रूप में यहां सभी को अपनी भावनाएं व्यक्त करने की पूरी आजादी है। पर हां, इस आजादी के साथ कुछ सर्ते भी जुड़ी हुई हैं। क्योंकि आजादी के नाम पर दी जाने वाली निरंकुशता दो व्यक्तियों अथवा समूहों के बीच किसी बड़े विवाद का कारण भी बन सकती है। और पिछले कुछ महिनों में इसके कई उदाहरण भी देखने को मिले हैं। वैसे पिछले कुछ सालों से सहज ही ये परिलक्षित हो रहा है कि हमारे ही देश के कुछ नेता तथा मीडियाकर्मी खुद को सेक्यूलर रूप देने की अथक चेष्टा में जुटे हुये हैं। ऐसा वे किस फायदे के उद्देश्य से कर रहें हैं ये समझ पाना हम जैसों के समझ से परे है किंतु ऐसे नेता तथा मीडियावालों के कारण देश के बहुसंख्यकों के सम्मान को ठेस पहुंच रही है इसमें कोई दो राय नहीं है। ऐसे व्यक्ति और संस्थाएं अपने फायदे के लिए चंद सिरफिरों की छोटी मोटी गलतीयों को आधार बनाकर इस देश के बहुसंख्यक समाज को निशाना बना रहें हैं और बिल्कुल निराधार तरीके से गाहे-बगाहे “भगवा अथवा हिंदू आतंकवाद” जैसे शब्दों का प्रयोग कर हिंदूओं को हरसंभव नीचा दिखाने की कोशिश में जुटे हुये हैं। और इनके इसी भेदभावपूर्ण रवैये से देश के बहुसंख्यकों में खासा गुस्सा है।

हमारे संविधान के अनुसार इस देश में सभी को समानता का हक है। किंतु वास्तव में वोट बैंक की राजनीति ने हिंदूओं को अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया है। यहां उनके साथ सदैव ही भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता रहा है। और इसका ताजा उदाहरण है बीफ बैन के विरोध में खुलेआम आयोजित किया गया बीफ फेस्टिवल। खान पान के अधिकार के नाम पर विभिन्न राजनैतिक पार्टियों तथा सामाजिक संस्थाओं द्वारा आयोजित किये गए बीफ फेस्टिवल ने हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाया है, उन्हें आक्रोशित किया है। जिसके परिणामस्वरूप देश की एकता के बीच दरार आई है। वैसे भी जिस देश में अस्सी प्रतिसत से अधिक हिन्दू रहते हों ऐसे देश में बीफ बैन के विरोध में उलजुलूल हरकतों को अंजाम देने से पहले बीफ समर्थकों को इस बात को सह समझ लेना चाहिये था कि जिस तरह से इस देश में किसी समुदाय विशेष को खाने पीने का अधिकार प्राप्त है;ठीक उसी प्रकार इस देश के बहुसंख्यक समाज को भी अपनी आस्था के अनुरूप पूजा-प्रार्थना का भी आधिकार है। और आगर कोई उसके इस अधिकार पे हमला करने की चेष्टा करेगा तो उसे भी कड़े विरोध का सामना करना पड़ेगा। फिर चाहे यह विरोध हिंषात्मक ही क्यों न हो। और वैसे भी निर्बोध प्राणियों के साथ क्रूरतम हिंसा दिखानेवालों का कहीं से यह अधिकार नहीं बनता कि वे अपने क्रिया की प्रतिक्रिया से नाराज होकर एक सहिष्णू और सभ्य समाज को गाली दें। उन्हें आतंकवादी कहें।

वैसे भी जरा-जरा सी बात पर देश में हिंदू आतंकवाद का रोना रोनेवालों को दुनिया में बढ़ते धार्मिक उन्मादरूपी आतंकवाद का धर्म नजर नहीं आता है। लंडन से लेकर मुंबई हमले तक का नजारा देखकर भी इन्हें ये समझ में नहीं आता है कि आतंकवाद का असल धर्म क्या है? इन्हें तो गैर धर्मालम्बीयों को काफिर कहकर उनकी बलि चढ़ानेवाले जिहादियों का धर्म भी समझ में नहीं आता है। यहां हम किसी संप्रदाय विशेष को आतंकवादी नहीं कह रहें हैं। पर हम उन लोगों की आंखों पर चढ़ा विषमता का चश्मा आवश्य हटाना चाहते हैं जिन्हें छोटी बड़ी हर बात पर इस देश में बस हिंदू आतंकवाद ही नजर आता है। किंतु अब हिंदू आतंकवाद की बात कहने वालों को ये समझना होगा कि मालेगांव ब्लास्ट में संलिप्त कोई भी आतंकी हिन्दू नहीं था। क्योंकि हिंदू धर्म कभी किसी प्रकार के हिंसा का समर्थन नहीं करता है। हिंदू धर्म तो मानव सेवा और मानव कल्याण के लिए बुद्ध और महावीर का रूप धारण कर विश्व में शांति और भातृत्वबोध का संदेश प्रसारित करता है। अगर कोई हिंदू कभी किसी बकरे के बच्चे की भी बलि देता है तो वह उस दिन से हिंदू नहीं रहता बल्कि उसी क्षण से वह राक्षसों की श्रेणी में आ जाता है। और ऐसे व्यक्तियों के लिए हमारे सास्त्रों में भी दंड का विधान किया गया है। हमारे समाज में भी ऐसे व्यक्तियों से संबध विच्छेद की परंपरा विद्यमान है। फिर मालेगांव विस्फोट जैसे एक अमानवीय कृत्य के लिए पूरे हिंदू समाज को आतंकवादी कहना कहां तक जायज है?

अब अगर अखलाक जैसों की बात करें तो इन हत्याकांडों को लेकर भी पूरे हिंदू समाज को कठघरे में खड़ा करना किसी भी तरह से जायज नहीं है। क्योंकि ये सारे हत्याकांड लोगों के भावनाओं और उकसावों पर आधारित हैं। वैसे भी अगर इन अपराधों की पृष्ठभूमि की अध्ययन की जाये तो मामला कुछ और ही नजर आता है। दरासल गोमांस से जुड़े इन हत्याकांडों पे गौर करने से पता चलता है कि इस तरह के अधिकतर मामले अन्य किन्ही कारणों से आरंभ हुये थे पर हालात बिगड़ जाने के बाद इन्हें सांप्रदायिक रंग दे दिया गया। उदाहरणस्वरूप हम गुरुवार की रात शटल में ट्रेन के भीतर हुये हत्याकांड की बात कह सकते हैं। इस मामले का अध्ययन करने पर पता चलता है कि पूरा मामला सीट को लेकर हुये विवाद से उत्पन्न हुई थी। जो बाद में दो गुटों के संघर्ष में परिवर्तित हो गई जिसमें एक युवक की जान चली गई। सीट के लिए शुरू हुये इस झगड़े में जब मामला बिगड़ने लगा तो इसे गोमांस की अफवाह से जोड़ दिया गया जो वास्तव में पूरी तरह से निराधार है तथा दुर दुर तक इसका गोमांस से कोई संबध ही नहीं है। और इस बात की पुष्टि स्वयं मृतक के परिजनों क्रमस: मनिराधारौलाना आस मोहमद और मौलाना जाहिद ने किया है। उन्होंने हत्या के संदर्भ में जीआरपी द्वारा की जा रही कार्रवाई को लेकर भी संतुष्टि जाहिर की है।

वहीं बात अगर अखलाक की करें तो मीडिया में आई खबरों के अनुसार इस दिल दहला देनेवाले हत्याकांड का संबंध पाकिस्तान संपर्क से जुड़ा हुआ है। खबरों के मुताबिक अपनी हत्या से कुछ रोज पहले ही अखलाख पाकिस्तान घुमकर लौटा था और पाकिस्तान से लौटने के बाद से ही उसकी गतिविधियां बदल गई थीं। बल्कि उसके व्यवहार से पड़ोसियो में संदेह उपजने लगा था। जिस कारण वह गांववालों का विश्वास खो चुका था। इसी बीच हत्यावाली रात अखलाख के परिवार द्वारा प्रदेश में प्रतिबंधित गोहत्या किये जाने की सुनकर गोपूजन में आस्था रखने वाले आधिकतर लोग आगबबूला हो गये और उन्होंने गुस्से में अखलाख के घर के बाहर जमावड़ा लगाना आरंभ कर दिया। जिसके बाद उक्त भीड़ के साथ अखलाख और उसके बेटे की बहस हो गई और फिर मामला मारपीट तक उतर आया। इसी हंगामें के बीच अधिक चोट लग जाने से अखलाख की मृत्यु हो गई। इस हत्याकांड का विरोध पूरे देश में हुआ।उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अखलाख के परिवार को मोटा मुवावजा भी दिया गया और इस हत्याकांड से जुड़े हुये सभी अपराधी आज पुलिस हिरासत में अपने किये की सजा काट रहें हैं। इस पूरे घटनाक्रम में एक मामला अखलाख के परिवार वालों के खिलाफ भी दर्ज किया गया है। गोहत्या का मामला। पर इसके बावजूद अखलाख के परिवार वाले आजाद हैं और सुकून की जिंदगी गुजार रहें हैं।

अब बात करते हैं गोरक्षकों द्वारा की जानेवाली हत्याओं की। ये भी एक महत्वपूर्ण विषय है। कारण इस मुद्दे को लेकर भी तुष्टिकरण की चासनी में डूबे रहनेवाले सेक्युलरों द्वारा आक्सर हिंदुओं पे भगवा आतंकवाद का ठप्पा लगाने का प्रयत्न किया जाता रहा है। पर कभी भी उनके द्वारा इन हमलों का प्रकृत कारण जानने की चेष्टा नहीं की गई। अब चाहे जो भी हो पर एक सच्चे हिन्दू होने के नाते हम ऐसी किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं करते। बल्कि हरेक सच्चा हिंदू ऐसे कुकृत्यों की घोर निंदा करता है। और सरकार तथा प्रसाशन से मांग करता है कि ऐसे अपराधियों पे सख्त से सख्त कार्रवाई करे। वैसे गोरक्षकों की कथित गुंडागर्दी की बात कहने से पहले हमारे लिए ये जान लेना बहुत जरूरी है कि ये देश भारतवर्ष सैंकड़ों वर्षों से सनातन धर्म का अपना निजस्व गृह रहा है। आदि काल से ही इस धरा पे वास करने वाले अधिकत्तर लोगों ने कृष्ण को अपना आराध्य माना है और उनकी प्यारी गायों को अपनी माता का दर्जा दिया है। इस देश में आज भी कोई भी शुभकार्य गाय के गोबर और दुध के बिना संपन्न नहीं हो सकता। आज भी गांवो के इस देश में अधिकतर घरों में पहली रोटी गाय के लिए निकाली जाती है। और इन बातों से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि अस्सी प्रतिसत बहुसंख्यकों के इस देश में गाय लोगों की आस्था और धर्म का विषय है और इस लिहाज से देश के ज़्यादातर राज्यों में ही गोहत्या निषेध क़ानून लागू है। यहां तक की केरल, पश्चिम बंगाल और असम में भी जहां आज भी बेरोक-टोक गायें काटी जाती हैं। ऐसे में पुलिस और प्रसाशन का यह दायित्व बनता है कि वे गोहत्या के इस अपराध पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाये परंतु वास्तव में पुलिस और प्रसाशन अपनी ड्यूटी सही ढंग से नहीं निभाते जिसके चलते गोहत्या पर क़ानूनी रोक होने के बावजूद समूचे देश में गोमांस के लिए चोरी-छुपे गायें काटी जाती हैं। जो एक निर्मम अपराध की श्रेणी में आता है। इस तरह से क़ानूनी बंदिशों के बावजूद देश के बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की जिद्द से की जानेवाली गोहत्या ने ही पूरे देश में गोरक्षकों की फौज कर दी है। जिन्हें कुछ शरारती तत्व अपने फायदे के लिए गुमराह कर रहें हैं और फिर ये नवयुवक जाने-अनजाने में गोहत्यारों पर कहर बनकर टूट रहें हैं। ये तो उन गोत्यारों का दुर्भाग्य है जो वे गोरक्षकों का सामना करने में असमर्थ हो रहें हैं और गोरक्षकों द्वारा उनकी जमकर खबर ली जा रही है। अब अगर पूरे घटनाक्रम को सही से देखे तो हम पायेंगे कि देश में गोरक्षकों ने कहीं भी किसी पे बम या गोला-बारूद से या फिर किसी धारदार हथियार से जान लेने के उद्देश्य से हमला नहीं किया है बल्कि उनके साथ हुये संघर्ष में पराजीत होने के कारण गोहत्यारों की मृत्यु हुई है। जिसे बाद में अपनी दुकान चलानेवालों ने गो रक्षकों की बर्बरता का नाम दे दिया है। जो असल में कुछ और है। और इस तरह से पुलिस और प्रसाशन की नाकामी को ढकने के लिए पूरे मामले को साप्रदायिक रंग दिया जा रहा है। क्योंकि गोहत्या भारत में हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। और अब इस मुद्दे को उछालकर राजनैतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की जा रही है।

कुछ लोगों को अक्सर कहते सुना जाता है कि भारत जैसे बहुलतावादी देश में किसी की रसोई या प्लेट में ताक-झांक करना और खान-पान के आधार पर या सिर्फ शक के आधार पर हमले करना निजी आज़ादी के हनन के दायरे में आता है। ऐसे में अभियुक्त पर मानव अधिकार हनन का मामला भी दर्ज होने चाहिये। यहां हम उनकी बात का समर्थन करते हैं। इस मुद्दे पर हमारा भी मानना है कि ऐसे निकृष्टतम कार्य के लिए अपराधियों को सख्त सजा मिलनी चाहिये।किंतु यहां एक और सवाल भी उठता है कि क्या गोहत्यारों पर भी धार्मिक भावना को आहत करने का मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए? क्या इस देश में बहुसंख्यक समाज का भी कोई अधिकार है या नहीं? अगर है तो उसके बारे में कोई चर्चा क्यों नहीं की जाती? क्यों हिन्दुओं अधिकारों के हक में कोई आवाज नहीं उठाता? क्यों हिन्दुओं की बात कहनेवालों को सांप्रदायिक कहा जाता है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर में ही वर्तमान गोरक्षकों से जुड़ी समस्याओं का समाधान छुपा है। याद रखिये कि ये गोरक्षक जन्म से ही इतने आक्रमक नहीं थे। इन्हें तो हमारी व्यवस्था ने इस प्रकार से अधैर्यशील बना दिया है कि वे न चाहते हुये भी हिंसा के मार्ग पे चल पड़े हैं। असल में ये पूरी लड़ाई संस्कृति और संस्कारों की लड़ाई है। जहां एक ओर संप्रदाय विशेष के लोग अपनी स्वाद के चक्कर में एक अत्यंत ही उपकारी बेजुबान पशु की हत्या कर देश के एक वृहत जनसंख्या वाले संप्रदाय के भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयत्न करते हैं और वहीं दूसरी ओर एक समाज विशेष के चंद गुस्सैल किशोर प्रसाशन से नाराज होकर अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अपने आपको संकट में डाल पशुधन की रक्षा का प्रयत्न कर रहें हैं। हां ये बात अलग है कि इन पशुओं की रक्षा और उनकी हत्या के प्रयास के लिए होने वाले इस संघर्ष में जीत जीवन बचाने वालों की हो रही है। और सायद इसी वजह से अपने खास वोटरों के कुकृत्य पर पर्दा डालने के उद्देश्य से इस मामले को अन्य रूप दिया जा रहा है। जबकी वास्तव में हिंदू अथवा भगवा आतंकवाद जैसी कोई सोच इस विश्व में है नहीं।

बाबरी मस्जिद ढहाये जाने को लेकर भी हिन्दुओं को निशाना बनाया जाता है। अक्सर कुछ विकृत मानसिकता के लोग बाबरी मस्जिद ढहाने को लेकर हिन्दुओं के विरूद्ध साजिश रचते हुये उन्हें बदनाम करने की नाकाम कोशिश करते नजर आते हैं। जबकि ऐसे लोग भलीभांति जानते हैं कि सनातन धर्म में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का क्या स्थान है। लोगों की आस्था और विस्वास किस कदर अपने आराध्य श्रीराम से जुड़ी हुई है। ऐसे में अपने धर्म पर हुये हर अत्याचार को सहने वाले हिन्दू अपने भगवान की जन्मस्थली पर हुये हमले को कैसे सहते। फिर यह तो जगत विदित है कि बाहरी आक्रमणकर्ता बाबर ने ही आयोध्या के प्राण स्वरूप राम मंदिर को तोड़कर उसे मस्जिद का रूप प्रदान किया था। इस लिहाज से प्राक ऐतिहासिक राम मंदिर का पुणः निर्माण हिन्दुओं का जन्मसिद्ध धार्मिक अधिकार है। वैसे भी जब भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने भी अपने अध्ययन से यह स्पष्ट कर दिया है कि उक्त विवादित स्थली राम मंदिर ही है तो ऐसे में यह सभी पक्षो का दायित्व बनता है कि वे हिन्दुओं की धार्मिक भावना का आदर करते हुये आयोध्या के उस पवित्र स्थल पर भव्य राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ करें। किंतु सारे साक्ष्य होते हुये भी इस मुद्दे पर सभी पक्ष चुप्पी साधे बैठे हैं जो हिन्दुओं के प्रति धोका है। एक अवर्णनीय अत्याचार है। ऐसे में उक्त विवादित मस्जिद को गिराये जाने के मामले में हिन्दू नेताओं के विरूद्ध एकतरफा कार्रवाई ने आग में घी का काम किया है। और इस वजह से भी देश में दोनों संप्रदायों के बीच आपसी विश्वास कम हुआ है। जिससे छिटपुट दंगों की घटनाएं बढ़ी हैं। और यह मामला तब और भी जटिल हो जाता है जब देश के कई हिस्सों में मन्दिरें तोड़ी जाती हैं और इसके बावजूद प्रशासन,पुलिस,मीडिया और रानैतिक पार्टियां चुप रहती हैं। हिन्दुओं पे होते हमलों को उपरोक्त संस्थाओं द्वारा नजर अंदाज किया जाना भी हिंदूओं के आक्रोश का एक बहुत बड़ा कारण है। जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप देश में दो संप्रदायों के बीच आपसी तनाव बढ़ा है।

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां सरकार चलाने वाले नेता, मीडियाकर्मी और चंद बुद्धिजीवीयों ने अपनी अपनी महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए संसार के सबसे सहिष्णू धर्म को मानने वालों की सहजता और सरलता का गलत फायदा उठाते हुये उनपर आतंकवादी और असहिष्णू होने का ठप्पा लगाया है जो अपने आप में एक निंदनीय कार्य है। अपने आपको सेक्युलर कहने वाले ये मुट्ठी भर लोग वास्तव में सेक्युलरिज्म का अर्थ ही जानते। इनको तो बस मलाई काटनी है और इसके लिए इन्होंने धर्म विशेष की चापलुसी शुरू कर दी है। और यही वजह है कि हिन्दू इनको लिए सबसे सॉफ्ट टारगेट बन गए हैं। इन्होंने आज तक किसी भी मुद्दे पे हिन्दुओं का समर्थन नहीं किया है। इनके लिए तो राम एक काल्पनिक पात्र हैं और उनका नाम सांप्रदायिकतावाद का कारण।

याद रखिये कि हिन्दू ना कभी आतंकवादी था और ना कभी बन सकता है। क्योंकि हिन्दूओं के बच्चों को बचपन से ही अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है। उन्हें 72 हूरों की कहानी के बदले आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति कराई जाती है जिससे आगे चलकर वो धर्म के रास्ते पे चलते हुये अपनी जननी, अपनी मातृभूमि का कर्ज चुका सकें। और इसी जज्बे के साथ हिंदू के बच्चे देश की रक्षा के लिए सेना में जाकर राष्ट्र सेवा में अपने जीवन की आहुति तक दे देते हैं। हिन्दू आतंकवाद को नहीं अपितु मानवता और मानव सेवा को अपंना धर्म मानते हैं। ये बातें सिर्फ मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि इस बात का प्रमाण हैं देश में रहने वाले बौद्ध,जैन,सिख आदि अन्य अल्पसंख्यक संप्रदाय के लोग। इतिहास गवाह है कि हिन्दुओं ने आज तक किसी पे पहला प्रहार नहीं किया है बल्कि हिंदुओं ने सदैव ही आत्मरक्षा में ही अस्त्र-शस्त्रों उठाये हैं। ऐसे में सर्वधर्म का सम्मान करने वाले हिन्दू धर्म को आतंकवाद से जोड़ना ना सिर्फ हिन्दू समाज का अपमान है बल्कि ये पूरे भारतवर्ष का अपमान है। हमारे ऋषि-मुनियों का अपमान है। हमारी वर्षो पुरानी “वसुधैव कुटुंबकम्” संस्कृति का अपमान है। हिन्दू धर्म को लेकर कहे गये ये अपशब्द हमारी वैदिक परंपरा का अपमान है। जाति-संप्रदाय से उपर उठकर एक सच्चा इंसान बनने की सीख देनेवाले हमारे पवित्र गीता अपमान है।

ऐसे लोग जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए देश के बहुसंख्यकों को आतंकवादी कहकर देश की छवि खराब करते हैं उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिये। ऐसे व्यक्ति को सामाजिक तौर पर अलग थलग कर देना चाहिये। जिससे की फिर कोई और हमारे समाज,हमारी संस्कृति और परंपराओं पे उंगली उठाने का दुसाहस ना कर सके। हमें ऐसे लोगों को ये बताना होगा कि इस संसार में अगर कोई ऐसा धर्म है जो वास्तव में सहिष्णु है तो वह बस हिन्दू धर्म ही है। जिसने कभी किसी गैर धर्म का अनादर नहीं किया है। हिन्दू धर्म ही इस जग में एकमात्र ऐसा धर्म है जो सभी धर्म के त्योहारों को समान रूप से सम्मान देता है। भारत के हिंदू ईद और क्रिसमस को भी उसी तरीके से मनाते हैं जैसे वे होली और दिवाली मनाते हैं। हिन्दुओं ने कभी नहीं कहा कि वे ईद की सिवैयां नहीं खायेंगे क्योंकि ये उनके धर्म के विरूद्ध है। उन्होंने क्रिसमस में भी चर्च जाने ईशा मसीह को प्रणाम करने से कभी मना नहीं किया। कभी इस देश में ईद के मौके पर मस्जिदों पे हमला नहीं होता। इस देश में कभी किसी व्यक्ति को उसके भेषभूषा के लिए प्रतिबंधित नहीं किया जाता। ये देश और इसके नागरिक सभी विविधताओं को बाहें खोलकर स्वीकार करते हैं। यहां आनेवाला हर व्यक्ति बस यहीं का हो रह जाता है। अब तो विदेशों में भी हिन्दू धर्म का डंका बजने लगा है। तो फिर कोई कैसे कह सकता है कि इस देश में हिंदू आतंकवाद नाम की कोई शक्ति है जिससे इस देश में रहने वाले अल्पसंख्यक समाज को खतरा है? ये बातें मेरी समझ से पड़े हैं? अगर आपको लगता है कि इस देश में हिंदू आतंकवाद जैसी कोई शक्ति है और वह हमारे देश में आतंक फैला रही है तो हमें पत्र लिखकर अवश्य अवगत कराएं।

मुकेश सिंह
राष्ट्रवादी स्तंभकार

मुकेश सिंह

परिचय: अपनी पसंद को लेखनी बनाने वाले मुकेश सिंह असम के सिलापथार में बसे हुए हैंl आपका जन्म १९८८ में हुआ हैl शिक्षा स्नातक(राजनीति विज्ञान) है और अब तक विभिन्न राष्ट्रीय-प्रादेशिक पत्र-पत्रिकाओं में अस्सी से अधिक कविताएं व अनेक लेख प्रकाशित हुए हैंl तीन ई-बुक्स भी प्रकाशित हुई हैं। आप अलग-अलग मुद्दों पर कलम चलाते रहते हैंl