कविता

मिटटी का बदन

यह मिट्टी का बना तेरा बदन भी यहीं हैं
और यह पानी जैसी दुनिया भी यहीं है
दोस्त भी यहीं है और कातिल भी यहीं है
राहों को चीरता हुआ मंज़िल को पहुँच जा
हिम्मत भी यहीं हैं और रास्ता भी यहीं है
तुझको न रोक पाएंगे, चट्टान और पर्वत
न तुझको घेर पायेंगें दरिया के ये भंवर
जितना घिसेगा उतना ही चमकेगा यह बदन
इस धूप में भी तपकर जब निखरेगा तेरा तन
तब तुझे देख देख दुनिया को होगी बहुत जलन
हर हाल में जीना है और रखना है खुश यह मन
राहों को चीरता हुआ मंज़िल को पहुँच जा
हिम्मत भी यहीं हैं और रास्ता भी यहीं है
है फ़र्ज़ यहाँ पर तो खुशियां भी यहीं हैं
इंसान की किस्मत का सामान यहीं है
कुछ देर की है रात तो सवेरा भी यहीं है
बसंत हो या पतझड़ बसेरा तो यहीं है
राहों को चीरता हुआ मंज़िल को पहुँच जा
हिम्मत भी यहीं हैं और रास्ता भी यहीं है

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845