धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

आनन्दस्वरूप ईश्वर से ही मनुष्य को असीम सुख की प्राप्ति सम्भव है

ओ३म्

संसार में आज का मनुष्य यदि किसी चीज की खोज करता हुआ दीखता है तो वह चीज सुख व शान्ति ही प्रतीत होती है। जन्म के बाद से माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को स्वस्थ एवं शिक्षित करने की प्रक्रिया आरम्भ होती है। इसके पीछे भी यही भाव है कि वह निरोग व बलष्ठि हों और ज्ञान प्राप्ति कर सुख व दुःख के भेद को जानकर यथार्थ सुख की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करें। आज की शिक्षा से मनुष्य यह सीखता है कि भौतिक पदार्थों की प्राप्ति में सुख विद्यमान है। वह अच्छे वस्त्र, भोजन, भवन, कार, बैंक बैलेंस को ही सुख का कारण व आधार समझता है। इसके लिये वह सर्विस, बिजीनेस करने, डाक्टर, इंजीनियर अथवा नेता बनकर धन कमाने का व्यवसाय करता है और प्रभूत धन अर्जित कर उसे भौतिक पदार्थों, जिसे वह समझता है कि उनसे सुख प्राप्त होगा, उसमें व्यय करता है। ऐसा करने पर भी अति धनाढ्य व्यक्तियों के जीवन को अभीष्ट सुख व शान्ति उपलब्ध नहीं होती। ऐसे उपाय करने के साथ मनुष्य को स्वास्थ्य संबंधी कई प्रकार के कायिक व मानसिक रोग भी लग जाते हैं परन्तु फिर भी उसे सुख व शान्ति का वास्तविक स्वरूप समझ में नहीं आता। हमने आजकल अधिक आयु के लोगों को देखा है जिनका व्यवहार भी सबके प्रति समान नहीं होता। कमजोर व दुर्बलों को वह दबाते हैं और अपने से अधिक धनिक व सामर्थ्य वाले लोगों के आगे झुकते व दबते हैं। ऐसे लोगों की भाषा भी क्रोध में आने पर अभद्र अर्थात् गाली-गलौज वाली देखी जाती है। सत्य व न्याय का व्यवहार वह अपने अति निकट के लोगों में ही करते हैं और अन्यत्र उनका व्यवहार स्वार्थपूर्ण ही दिखाई देता है। ऐसे लोग कुछ भी कर लें कभी सुख, आनन्द व शान्ति को प्राप्त नहीं हो सकते।

वास्तविक सुख व शान्ति कहां है? इसका उत्तर आध्यात्मिक साहित्य में मिलता है। अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि कि ईश्वर सत्य+चित्त+आनन्द अर्थात् सच्चिदानन्दस्वरूप है। इसका अर्थ है कि ईश्वर आनन्द अर्थात सुख व शान्ति से युक्त है। ईश्वर का आनन्द से युक्त होना इस कारण से भी है कि वह सर्वव्यापक और सर्वज्ञ है। वह आनन्द से युक्त व सर्वशक्तिमान है, इसी कारण वह इस अनन्त सृष्टि को बनाकर उसे धारण करता है और सृष्टि का पालन करते हुए सब जीवों को सुख पहुंचाने के साथ उनके कर्मफलों को प्रदान करता है। ईश्वर से भिन्न दूसरा चेतन तत्व वा पदार्थ जीवात्मा है जो सत्य+चित्त, ज्ञान व कर्म की सामर्थ्य रखने वाला, अतिसूक्ष्म, एकदेशी, ससीम, अल्पज्ञ, अनुत्पन्न, अनादि, अमर, अविनाशी, जन्म-मरण धर्मा, शुभाशुभ कर्मों को करने वाला तथा उन कर्मों का भोक्ता आदि गुणों से युक्त है। जीवात्मा सत्य और चेतन तो है परन्तु सुख वा आनन्द से रहित है। अतः मनुष्य आनन्द जिसे सुख व शान्ति आदि नामों से जानते हैं, उसकी प्राप्ति के लिये प्रयत्नरत रहता है। इसी के लिए अल्पज्ञता व वैदिक ज्ञारन विहीनता के कारण वह भौतिक पदार्थों को स्थाई सुख का कारण भी मान लेता है और पुरुषार्थ व अन्य कार्यों से धन अर्जित कर उससे इच्छित भौतिक पदार्थों का संग्रह कर अस्थाई सुखों को प्राप्त करता है। यह पुरुषार्थ व इससे अर्जित भौतिक सुख कालान्तर में उसके दुःख का कारण भी बन जाते हैं और वह रोगी होकर संसार से चला जाता है। इनमें से यदि कोई व्यक्ति अपने भाग्य व संयोगवश वैदिक धर्म व आर्यसमाज आदि के सम्पर्क में आ जाता है तो उसे यथार्थ सुख व भौतिक सुख का अन्तर विदित हो जाता है और वह सत्यार्थप्रकाश व सन्ध्योपासना विषयक नाना प्रकार के वैदिक साहित्य का अध्ययन व स्वाध्याय कर यथार्थ सुख के अजस्र स्रोत ईश्वर व उसकी उपासना को जानकर उसे यथासमय करके अपने जीवन में सुख व शान्ति को अनुभव करता है। ईश्वरोपासना पर कुछ और चिन्तन करते हैं।

ईश्वर व जीवात्मा दोनों चेतन सत्तायें हैं। ईश्वर सर्वव्यापक है और उसमें सर्वत्र आनन्द ही आनन्द वास कर रहा है। जो मनुष्य ईश्ष्वर के सम्पर्क में आता है वह भी आनन्द से सराबोर हो जाता है। इसके लिए जीवात्मा अर्थात् मनुष्य को स्वयं को  ईश्वर का ध्यान करना होता है। ईश्वर के गुणों का ध्यान करने से उसके अपने दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःख दूर हो जाते हैं और उसका आत्मा ईश्वर के अनुरूप गुण, कर्म व स्वभाव से युक्त हो जाता है। यह इसी प्रकार होता है जिस प्रकार की उष्णता से आकुल मनुष्य नदी या सरोवर में स्नान के लिए प्रविष्ट होता है तो उसके शरीर की उष्णता दूर हो जाती है और वह जल की शीतलता से स्वयं को सराबोर पाता है। दूसरा उदाहरण अग्नि का भी ले सकते हैं। एक व्यक्ति सर्दी से आकुल है। वह यदि अग्नि के समीप चला जाये तो उसके ताप से उसकी सर्दी व ठण्ड दूर हो जाती है। यह संगति के कारण होता है। इसी प्रकार से यदि कोई अज्ञानी मनुष्य किसी ज्ञानी मनुष्य की संगति करता है तो समय के साथ साथ वह उसके अनेक गुणों से युक्त हो जाता है। विद्यालय या गुरुकुल में आचार्य वा आचार्यों की संगति से एक बालक कालान्तर में अपने आचार्य के समान व उससे भी अधिक विद्वान बन जाता है। ऋषि दयानन्द ने भी यही किया था। वह देश भर में घूमें थे और उन्होंने धार्मिक व सामाजिक विद्वानों की संगति की थी और उपलब्ध साहित्य व ग्रन्थों का अध्ययन किया था। योगियों से योग सीखा और देश की गुलामी व दुःखों का चिन्तन कर उसके कारणों पर विचार किया। इसका परिणाम यह हुआ कि वह विश्व के एक ऐसे वैदिक, धार्मिक, सामाजिक विद्वान एवं नेता बने जिनके समान सदाचारी और धार्मिक विद्वान समूचे पृथिवी तल पर कहीं नहीं हुआ। वह न भूतों न भविष्यति प्रकार के विद्वान व नेता हुए हैं। उन्होंने ही इस रूग्ण देश को अपनी ज्ञानोपदेश की औषधि खिलाकर स्वस्थ व स्वतन्त्र किया है। उन्होंने सभी प्रकार के आवश्यक समाज सुधारों को भी किया और देश से अविद्या का नाश करने का अपूर्व कार्य किया। सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग तथा अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि ही देशोन्नति के प्रमुख साधन है। इसके साथ मनुष्य को सदाचारी व धार्मिक बनाने के लिए उसे ईश्वर व जीवात्मा का यथार्थ ज्ञान कराया जाना चाहिये और मनुष्य ईश्वरोपासक भी होना चाहिये। इससे वह चिर सुख-शान्ति अर्थात् मोक्ष को प्राप्त हो सकता है।

महर्षि पतंजलि ने अतीत में योग दर्शन नाम के एक उपासना ग्रन्थ की रचना की है। विश्व में उपासना की दृष्टि से योग दर्शन के समान कोई दर्शन व ग्रन्थ नहीं है। देश देशान्तर के प्रमुख मतों के प्रवर्तक भी इस योग दर्शन के ज्ञान से सम्पन्न नहीं थे। यही कारण है कि आज संसार योग पर विश्वास करके उसे अपना रहा है और पूर्व की भ्रान्तियों का त्याग कर विश्व के मनुष्यों ने योग व ध्यान करके उससे होने वाले आध्यात्मिक, मानसिक व आत्मिक सुखों सहित योग से स्वस्थ जीवन को प्राप्त करने के सिद्धान्त की पुष्टि की है। योग को अपना कर पुरुषार्थमय व वेदानुकूल जीवन बनाकर हम अपने जीवन में अल्प भौतिक साधन होते हुए भी पूर्ण सुखी जीवन व्यतीत कर सकते हैं। इसके लिए हमें वैदिक साहित्य के अध्ययन सहित वैदिक धर्म व आर्यसमाज से जुड़ना होगा। सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर हमारी बुद्धि असाधारण शक्ति से सम्पन्न होकर सत्य व असत्य का विवेक करने में समर्थ होगी। ईश्वरोपासना का महत्व उसे विदित होगा। ऐसा करके ही वह अपने वर्तमान जीवन में सुख प्राप्त कर परजन्मों में श्रेष्ठ मनुष्य योनि प्राप्त कर सुखों का भोग कर सकता है। जीवन मुक्ति व मोक्ष, जो असीम सुख व चिर-शान्ति की अवस्थायें हैं, वह भी योगाभ्यास से ही प्राप्त होती हैं। इति ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य