गीत/नवगीत

उस रोज़ दिवाली होती है

जब मन में हो मौज-बहारों की ,
चमकाए चमक सितारों की ,
जब खुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई में भी मेले हों
आनंद की आभा होती है ,
उस रोज़ दिवाली होती है.

 

 

जब प्रेम के दीपक जलते हों ,
सपने जब सच में बदलते हों ,
मन में हो मधुरता भावों की ,
जब लहकें फसलें चावों की ,
उत्साह की आभा होती है ,
उस रोज़ दिवाली होती है.

 

 

जब प्रेम से मीत बुलाते हों ,
दुश्मन भी गले लगाते हों ,
जब कहीं किसी से वैर न हो ,
सब अपने हों कोई ग़ैर न हो ,
अपनत्व की आभा होती है ,
उस रोज़ दिवाली होती है.

 

 

जब तन-मन-जीवन सज जाए ,
सद्भाव के बाजे बज जाएं ,
महकाए खुशबू खुशियों की ,
मुस्काए चंदनिया सुधियों की ,
तृप्ति की आभा होती है ,
उस रोज़ दिवाली होती है.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

3 thoughts on “उस रोज़ दिवाली होती है

  • राजकुमार कांदु

    आदरणीय बहनजी ! सचमुच जब आनंद की आभा होती है उस रोज दीवाली होती है । कहा भी गया है मन के हारे हार है , मन के जीते जीत ,। मन ही सभी क्रियाओं का कारक है और जब मन में मौज हो , मन खुश , सुखी व प्रफुल्लित हों तभी कोई त्योहार संभव है । इसी भाव को आपने बखूबी शब्दों में ढाला है । हमेशा की तरह एक और सुंदर सृजन के लिए आपका धन्यवाद !

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    सुन्दर रचना लीला बहन .

  • लीला तिवानी

    जिस दिन मन में बहारों की मौज-ही-मौज हो, उसी दिन त्योहार होता है.

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