लघुकथा

दृढ़ प्रतिज्ञ

अमर के पापा बंसीलाल आज अचानक उससे मिलने आ गए थे । अमर पापा से हालचाल पूछ कर किचन में उनके लिए चाय बना ही रहा था कि रूबी ने कमरे में प्रवेश किया । ”  अमर ! कहाँ ……”  कमरे में अनजान व्यक्ति को देखते ही बाकी के शब्द रूबी के हलक में ही घुटकर रह गए ।
उसी समय हाथों में चाय की प्याली थामे हुए अमर ने हॉल में प्रवेश किया । ” रूबी ! ये मेरे पिताजी हैं ! “
 ” नमस्ते अंकल ! ” रूबी ने तुरंत ही उनका अभिवादन किया और अपने कमरे में चली गयी । चिंता की लकीरें बंसीलाल के चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थीं ।
  पापा के मनोभावों को समझते हुए अमर कहने लगा ” पापा ! वैसा कुछ भी नहीं है जैसा दिख रहा है । ये लड़की रूबी अपने परिवार की एकमात्र कमानेवाली है । सैलरी इतनी नहीं कि यहां महानगर में इतना महंगा घर लेकर अकेले रहे । इसके अलावा यहां अकेले लड़के या लड़की को घर मिलना भी मुश्किल है । अब हम दोनों लोगों की नजरों में एक ही घर में रहते हैं लेकिन हमारे कमरे अलग अलग हैं ।
 पापा ! आपने ही कहा था कि किसी की मदद करने में यदि कोई परेशानी भी आये तो हंस कर झेल लेना चाहिए । यद्यपि एक ही घर में एक लड़की और लड़के का दो अलग कमरों में रहना आसान नहीं है लेकिन हम आपकी इसी बात को ध्यान में रखकर एक दूसरे की मुश्किल को आसान कर रहे हैं । रूबी भी मेरी ही तरह दृढ़ प्रतिज्ञ है । ” अब बंसीलाल को अपने बेटे पर फख्र हो रहा था ।

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।

4 thoughts on “दृढ़ प्रतिज्ञ

  • लीला तिवानी

    प्रिय ब्लॉगर राजकुमार भाई जी, वाह क्या बात है! बहुत सुंदर. दृढ़ प्रतिज्ञ बेटे के आज्ञापालन से उत्साहित होकर बंसीलाल का फ़ख़्र करना स्वाभाविक है. अत्यंत सटीक व सार्थक रचना के लिए आपका हार्दिक आभार.

    • राजकुमार कांदु

      आदरणीय बहनजी ! आज के युग में ऐसे सच्चरित्र पुत्र को पाकर पिता का खुश होना स्वाभाविक ही है । अति सुंदर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका हृदय से धन्यवाद !

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    in todays world, one should go with time or he or she will have a pain of a generation gap . excellent short story .

    • राजकुमार कांदु

      हार्दिक आभार आदरणीय भाईसाहब !

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