कविता

ज़रा ठहर कर सुन तो सही

क्या कहती है जिन्दगी
ज़रा ठहर कर सुन तो सही ।
अगणित प्रसून फैले है इस धरा पर
ज़रा ठहर कर बुन तो सही,
क्या कहती है जिन्दगी
ज़रा ठहर कर सुन तो सही ।
कितनी दूर से चलता आया है !
किधर को जाना है,
कहां तक जाना है,
कब तक यूं चलते ही जाना है,
कभी ठहर कर ख़ुद से सुन तो सही,
क्या कहती है जिन्दगी
ज़रा ठहर कर सुन तो सही ।
माना मंजिलें कभी ख़ुद नहीं आती
राही को ही उस तक जाना होता है,
स्वेद का अर्घ्य चढ़ा-चढ़ा कर
राही को ही उसे पाना होता है,
पर इस जिन्दगी के अफसानों को भी
कभी ठहर सुन तो सही
क्या कहती है जिन्दगी
ज़रा ठहर कर सुन तो सही ।
हां ! समय का चक्र अनवरत है
बली ना कोई इसे रोक पाया है,
हर जतन के बाद भी
पीछे ना कोई इसे झोंक पाया है,
पर अकुलाती, कौंधती नज्मों को भी
कभी ठहर सुन तो सही,
क्या कहती है जिन्दगी
ज़रा ठहर कर सुन तो सही ।
जुनुनियत के इस प्रचण्ड तूफ़ान से
मंज़िल शायद तू पा भी जायेगा,
ख़ुद के हर बसन्त को खोकर
साहिल तक शायद आ भी जायेगा,
पर एक बार मिली इस जिन्दगी के
मधुर *अकूत दुलार के मायने
आख़िर कभी ठहर सुन तो सही,
क्या कहती है जिन्दगी
ज़रा ठहर कर सुन तो सही ।
अगणित प्रसून फैले है इस धरा पर
ज़रा ठहर कर बुन तो सही,
क्या कहती है जिन्दगी
ज़रा ठहर कर सुन तो सही ।
— आंनद प्रकाश जैन
(*अकूत- बेहिसाब )

आंनद प्रकाश जैन

चित्तौड़गढ़ (राजस्थान),312022