कविता

नमामि जाह्नवी भगीरथी

नमामि जाह्नवी भगीरथी तुझे प्रणाम है।
सुधा प्रवाहिनी शुभारती तुझे प्रणाम है।
नदी न दीन देखती,प्रवाह मान ही रहे।
नमी न मीन खोजती प्रसार वान ही रहे।
जहाँ गयी वहीं रहा,प्रवास दिव्य धाम है।
नमामि जाह्नवी भगीरथी तुझे प्रणाम है।
मही न पाप बोझ से,नहीं दबे थके नहीं।
नही न ताप बोध से,नहीं जले रुके नहीं।
समस्त पाप मूल से,विनाश ही अकाम है।
नमामि जाह्नवी भगीरथी तुझे प्रणाम है।
प्रताप पूर्वजी रहा,असंख्य यत्न जो हुए।
अनन्य भक्ति साधना,अखंड यज्ञ जो हुए।
भगीरथी प्रयास से,धरा हुयी ललाम है।
नमामि जाह्नवी भगीरथी तुझे प्रणाम है।
समस्त पुण्यदायिनी,समस्त पाप नाशिनी।
समस्त मूल मंत्र हो,समस्त जाप वासिनी।
ममत्व छांव गोद माँ,नदीश्वरी प्रणाम है।
नमामि जाह्नवी भगीरथी तुझे प्रणाम है।
धरा कुटुंब सी बने,प्रकीर्णता निवास हो।
उदारता विशेष हो,विशेषता प्रयास हो।
नमस्तुते शुभारथी प्रयास को प्रणाम है।
नमामि जाह्नवी भगीरथी तुझे प्रणाम है।
— पंकज त्रिपाठी

पंकज त्रिपाठी कौंतेय

हरदोई-उत्तर प्रदेश