लघुकथा

महक

“मम्मी जी, इस बार हमारा होली पर आना जरा मुश्किल लग रहा है.” इंग्लैंड से मालती जी की पुत्रवधू नलिनी ने फोन पर कहा.
“अरे, क्या बात हो गई! आप लोगों की तो टिकटें भी बुक थीं न!” मालती जी ने खिन्नता से कहा.
“हां जी मम्मी जी, कोविड का अधिक प्रसार होने से सरकार का अनुग्रह है, कि अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अनावश्यक यात्राएं रोकी जाएं, इसलिए टिकटें कैंसिल करवानी पड़ीं.” नलिनी की आवाज में भी थोड़ी मायूसी थी.
“ये लो, हम तो कितनी उम्मीदें लगा बैठे थे! तुम्हारी ननद मोनिका तो खुशी से नाच रही थी, कि इस बार भैय्या-भाभी के साथ होली में बहुत मजा आएगा.” मालती जी ने कहा.
“मम्मी जी, मोनू भी नाच रहा था, कि बड़े सालों के बाद बुआ जी के साथ होली खेलने में बहुत मजा आएगा.” नलिनी ने कहा.
“चलो बेटा, जहां रहो, सुखी रहो, सुरक्षित रहो”.
“मम्मी जी, आप सब लोगों के लिए गिफ्ट्स लेके रखी थीं, वो कोरियर से भेज रहे हैं. शैला आंटी ठीक होंगी, उनकी बेटी के लिए भी जींस भेज रहे हैं.”
“अरे! यह तो बहुत अच्छा कर रहे हो! उसको आप लोगों के आने का बताया तो बहुत खुश हो रही थी. कह रही थी कि भैय्या-भाभी आएंगे तो वह होली वाले दिन भी सबके यहां छुट्टी करेगी, पर हमारे यहां काम करने आएगी.”
“अच्छा ममी जी, अब फोन रख रही हूं, मोनू को स्कूल से लाने का टाइम हो गया है.” मालती जी ने फोन तो रख दिया, पर उदासी को दूर नहीं रख पाईं. शैला आंटी ने सुना तो वह भी तनिक मायूस-सी दिखी.
समय तो अपनी गति से भागता है. होली भी आ गई. सबके साथ मिल-जुलकर होली खेलने में उदासी काफूर हो गई थी.
शैला आंटी को हर साल की तरह नए कपड़े, मिठाई आदि के साथ बेटी के लिए इंग्लैंड से आई जींस भी मिली, तो उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था. उसके आशीर्वादों की महक इंग्लैंड तक पहुंच गई थी.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244