राजनीति

भारतीय गणतंत्र की महिमा

हमारा गणतंत्र अब अपने 75 वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है l इस अवधि में तमाम उतार चढ़ावों के साथ भारत के गणतंत्र ने एक सफल यात्रा पूर्ण की है lसंवैधानिक प्रक्रिया द्वारा निर्धारित अवधि के भीतर सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण,संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों व कर्तव्यों के मध्य युक्तियुक्त समन्वय और राज्य द्वारा कल्याणकारी भूमिका का निभाया जाना एक स्वस्थ लोकतंत्र के विकास की पुष्टि करता है l हमारी सफल जनतांत्रिक प्रणाली ने ब्रिटिश साम्राज्य के आकाओं ,लेखकों व इतिहासकारों के द्वारा किये गए उन दावों को सिरे से ख़ारिज किया है ,जो भारत में ब्रिटिश द्वारा भारतीयों के पक्ष में सत्ता हस्तांतरण में सदैव बाधक बनते आये थे l इसमें एक बड़ा नाम था सर जॉन स्ट्रेची का,जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘इंडिया’ में यह दावा किया था कि राष्ट्र के नाम पर ‘हिन्दुस्तान’ एक ऐसे विशाल क्षेत्र का नाम है जिसमें बहुत सारे राष्ट्र एक साथ रह रहे थे l इस किताब में यह भी कहा गया था कि यूरोप के देशों में आपस में उतना अंतर नहीं है जितना भारत के राज्यों के बीच है l इसके अनुसार अगर इस बड़े क्षेत्र के कुछ हिस्सों में राष्ट्र की भावना जाग भी जाये तो यह मान लेना असंभव है कि पंजाब ,उत्तर-पश्चिमी प्रान्त,बंगाल और मद्रास के ओग कभी यह महसूस कर पायेंगे कि वे एक राष्ट्र के हिस्से हैं l कुल मिलाकर स्ट्रेची का निष्कर्ष यह था कि हिन्दुस्तान के बारे में जो बात जानना सबसे जरूरी है वो यह कि न तो अतीत के किसी समय में भारतीय राष्ट्र का अस्तित्व था और न ही ऐसी किसी धार्मिक,राजनीतिक,सामाजिक या भौतिक इकाई के उद्भूत होने की सम्भावना थी l इसी तरह मशहूर ब्रिटिश लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने कहा था कि भारतीय लोग इतने पुराने हैं कि हमारी शासन प्रणाली को सीख ही नहीं सकते,इस प्रकार एक भारतीय स्वाधीन राष्ट्र का जन्म असंभव है l यहाँ तक कि 1960 के दशक में भी विदेशी पत्रकारों द्वारा यह आशंका व्यक्त की गई कि 50 करोड़ आबादी वाले इस् विशाल देश में इतनी भाषाओँ ,आपसी धार्मिक लडाइयों और तमाम नस्लों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि एक राष्ट्र के रूप में इसका अस्तित्व लम्बे समय तक कायम रह पायेगा l परन्तु स्वतंत्रता आंदलन के दौरान चलने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण ने भारत के विभिन्न हिस्सों के बीच संस्कृति ,क्षेत्र,धर्म,और भाषा की खाई को पाटने का काम किया और एक एकीकृत राष्ट्र की संकल्पना ने साकार रूप लेना प्रारंभ किया l जिसकी परिणिति एक संप्रभु व सशक्त संविधान के रूप में हुई l एक जनापेक्षी संविधान सभा द्वारा स्वतंत्र ,संप्रभु समावेशी संविधान की रूपरेखा बनायी गयी जिसका ताना-बाना विभिन्न कानूनविदों ,सामाजिक व राजनीतिक चिंतकों तथा भारतीय जनमानस के ह्रदय मर्मज्ञों द्वारा 2 वर्ष,18 माह,11 दिनों में बुना गया l भारत का संविधान अपने नागरिकों को न्याय,समानता व स्वतंत्रता की गारंटी देता है जिसमें सामाजिक,राजनीतिक व आर्थिक न्याय अवसर व कानून के समक्ष समानता ,विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास,धर्म तथा उपासना ,रोजगार,व संगठन बनाने की स्वतंत्रता शामिल है l पिछड़े तथा अल्संख्यकों को विशेष सुरक्षा प्रदान करने की दृष्टि से संविधान में विशेष प्रावधान किये गए हैं ताकि वे भारतीय संकल्पना भारतीय संविधान में साकार रूप लेती दिखाई देती है ,लोकतंत्र व स्वाधीनता राष्ट्रीय क्रांति को साकार करती है जो ब्रिटिश शासन काल में हर भारतीय के लिए एक अभूतपूर्व स्वप्न के समान था जबकि समानता व स्वतंत्रता के आदर्श सामाजिक क्रांति का स्वप्न साकार करते हैं ,जो तत्कालीन भारत में विशेष रूप से तथाकथित निन्म जातियों व महिलाओं के लिए स्वप्निल था l भारतीय संविधान की नींव जनता को माना गया है,संविधान का स्रोत जनता है जिसकी अभिव्यक्ति संविधान की प्रस्तावना के प्रथम शब्दों में ही हो जाती है –“हम भारत के लोग……. “भारतीय संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान कहलाता है और यह प्रत्येक नागरिक के स्वप्नों की सम्पूर्ण श्रृंखला को अपने में समाहित करता है ग्रेनविल ऑस्टिन के शब्दों में, “सन 1787 में फिलाडेल्फिया में जो राजनीतिक परियोजना( अमेरिकी संविधान लिखने की ) शुरू की गयी थी उस के बाद से भारतीय संविधान का निर्माण संभवतः सबसे महान राजनीतिक कवायद थी l” यह भारतीय संविधान ही था जिसने भारतरुपी पूर्ण,स्वस्थ व परिपक्व लोकतंत्र को आकार प्रदान किया और आज के भारत को हम एक नए कलेवर में देख सकते हैं :आत्मनिर्भरता से परिपूर्ण,विश्व के नेतृत्व को तैयार दीखता भारत एक मजबूत संविधान की नींव पर खड़ा है जो वर्षानुवर्ष अपने नए लक्ष्यों पर और आगे बढ़ता जा रहा है l   जय संविधान,जय गणतंत्र

लवी मिश्रा

कोषाधिकारी, लखनऊ,उत्तर प्रदेश गृह जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश