सम्बन्ध का बन्धन
मौसम की सरगम
बिखरे स्नेह की धारा
बंधन मुस्काए
धूप की किरनें
रिश्तों को सींचती हैं
मन का विश्वास
प्यारे आलिंगन
जैसे बगिया में फूल
सुगंध लुटाएँ
साँझ की चुप्पी
थामे हाथों का सुकून
स्नेह अमर रहे
सपनों की डोर
बंधन को सजाती है
अनुपम गाथा
बरसों की धड़कन
जुड़ती है आत्मा से
प्रेम अमर बंधन
सागर की लहर
मन के तार छू जाती
गहरा अपनापन
बंधन की शीतल
फुहारें बहती जाएँ
जीवन महकाए
— डॉ. अशोक
