जननी
खिडकी से वह दूर तक नजरें गढ़ाए बैठी थी।
” कहकर गया है, जल्द ही लौटूंगा।”
” अब तक नहीं आया रितेश? ”
पास खडी परिचारिका से मंगला ने कातर स्वर में पूछा।
फिकी मुस्कान के साथ वह अपना काम करती रही।
धीरे-धीरे मंगला सबके साथ घुल-मिल रही थी।
लेकिन रितेश की याद बार-बार उसे विचलित कर रही थी।
” सच्चाई स्वीकार कर लो माँ जी। अब रीतेश आपको लेने नहीं आयेगा।”
” सब कुछ समेटकर वे विदेश चले गये हैं।”
पड़ोस में रहने वाली मीता ने सब कुछ सच बता दिया।
धुंधली आंखों से पलभर के लिए जैसे अंगार निकल पडे।
अगले ही पल आँसुओं का सैलाब था।
” बेटा, मुझे भी ले चलो।”
माँ का दिल बेटे की कृतघ्नता को मानने को राजी नहीं था।
” नहीं। ऐसा नहीं हो सकता। रितेश जरूर आयेगा।
जननी हूं मै उसकी। मुझे पूरा विश्वास हैं।
वह जरूर आएगा।
अपने नादान बेटे की बुराई कैसे सह पाती वह?
