पश्चिमी नववर्ष पर व्यंग हिंदी नववर्ष की उमंग
धूम-धड़ाम तड़ाक धड़ाक, बजत ढोल मृदंग नहीं,
मद्य-मत्त मद-अंध मनुज, करत कुत्सित ढंग कहीं।
बर्फ-तुषार ठिठुरत रैन, न कोई पात न फूल खिले,
झूठो उत्सव, झूठो जोश, काल-चक्र की राह हिले
थर-थर काँपत, ओस चाटते, पहन कोट पर फैशन नंग,
डीजे बाजत, कान फाड़ते, हुल्लड़ मचवत बद-बद रंग।
केक काटि कैं, मुँह पै मलते, जैसैं कोऊ भयो अनर्थ,
आधी रातहिं, हुक्का फूंकत, गँवा रहे निज बुद्धि समर्थ
‘हैप्पी न्यू ईयर’ चिल्लावत, जैसैं लंका दहन भयो,
भोर होत ही उतरि जाय सब, जो कछु जोश सवार भयो।
बिना नहाये, बिना धोये ही, ‘हैप्पी’ कहि-कहि गात फुलाय,
कूकत जैसैं रात के कुक्कुर, त्यों ये नर मद माहिं अघाय
ऋतु न बदली, भोर न बदली, बदलो बस दीवार को टाँगो,
नये कलैंडर की ले लो बधाई, अब पच्छिम सों भीख न माँगो।
भानु कहै सुनु ‘रंज’ बावरे, मति मारी जो तारीख पै नाचै,
कीचड़ माहिं साल मुबारक, जो कतहुँ से भी नूतन न बाँचै
पर अनूप चैत्र प्रतिपदा, जब डमरू निनाद करे,
नवल-किसलय, कोकिल-कूँज, सृष्टि नव-अवतार धरे।
खेत झूमते, स्वर्ण गेहूँ, लक्ष्मी पग-पग डोल रही,
मृदु-मलय की मन्द बयार, कानन घूँघट खोल रही।
पर जब आवत, चैत मास तब, डमरू बजत प्रकृति के द्वार,
नीम चबावत, देह शुद्धि कर, सजती घर-घर बंदनवार।
कोकिल कूजित, अमवा मौरित, अंबर डारत कनक गुलाल,
माटी महकत, अन्न लहलहत, तबहिं होत है नूतन साल।।
ब्रह्म-मुहूर्त, सूर्य-अर्घ्य, वेद-ध्वनि जब गूँज उठे,
सकल चराचर हर्षित मन, तब कलियों के पुंज फुटे।
भानु कहै सुनु ‘रंज’ जगत को, ये तौ ब्रह्म-सृष्टि को पर्व,
ऋषि-मुनि गावत, वेद ऋचाएँ, जापै कीजै मोटो गर्व
— भानु शर्मा रंज
