सूने आँगनों की गवाही
आँगन सूने हैं,
दीवारें गिनती हैं
उन पगचिह्नों को
जो कभी पड़े ही नहीं।
जिन बेटियों को
जन्म से पहले
हमने चुपचाप विदा कर दिया,
आज उनकी अनुपस्थिति
दरवाज़ों पर खड़ी है।
करोड़ों की दौलत
इस सन्नाटे को
भर नहीं पाती,
और नाम, वंश, प्रतिष्ठा
सब मौन हो जाते हैं।
यह कोई दंड नहीं—
यह हमारी ही
निर्दय चुप्पी की
धीमी-धीमी फसल है।
यदि अब भी
जीवन को
सम्मान से नहीं देखा,
तो यह सन्नाटा
पीढ़ियों तक
हमारे साथ चलेगा।
— डॉ. प्रियंका सौरभ
