संस्मरण

मेरी जम्मू-कश्मीर यात्रा

यात्राएँ करना सम्भवतया मेरा स्वभाव ही बन गया था अथवा नियति, लेकिन परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव और देश की तत्कालीन परिस्थितियों में मैं सोच भी नहीं सकती थी कि कभी मुझे कश्मीर भी जाने का मौका मिलेगा। जब से होश सँभाला है सुनती आई थी कि धरती पर कहीं स्वर्ग यदि है तो वह कश्मीर में ही है। आज उसी स्वर्ग के दर्शन करने का अवसर अकस्मात उपस्थित हो गया।
हुआ यूँ, कि मेरे सम्पर्क में एक कश्मीरी लड़का डॉक्टर इकबाल भट्ट था। वह मेरे ही मकान में रहता था। उन दिनों मैं अपने निजी घर-गाँव गौरा में रहती थी जो शिमला जिला में पड़ता था। जम्मू मेरा आना-जाना अक्सर ही होता रहता था। वहाँ मेरी एक बहुत पुरानी मित्र वीना शर्मा रहती थीं, उनकी बेटी रोहिणी का विवाह था। डॉक्टर इकबाल भी मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो गया। तब मैंने सोचा था कि उसे अपने घर जाने की इच्छा हो रही होगी परन्तु बहुत बाद में मेरी समझ में आया कि वह बहुत ही डरपोक था और गाँव के मेरे मकान में वह अकेले रहते हुए डर रहा था। अस्तु,
   रोहिणी के विवाह के बाद मैं डॉक्टर के आग्रह पर अपनी मित्र वीना और उसके परिवार से विदा लेकर इकबाल भट्ट के घर ‘दिलना’ जो बारामूला जिला का एक गाँव है के लिए चल पड़ी। मन में विचित्र सी उत्सुकता थी, अजब रोमाँच, अनजाना-सा कौतुहल। कैसा माहौल होगा वहाँ का? सभी लोगों का कहना था कि मुझे कश्मीर नहीं जाना चाहिए क्योंकि वहाँ का माहौल अभी तक ठीक नहीं हुआ था, परन्तु खतरों से खेलना मेरा स्वभाव बन चुका था या अपने हालात से विद्रोह का यह एक सशक्त माध्यम मुझे अनजाने में ही दूर कहीं दूर ले जाता और मैं जहाँ जी चाहता वहाँ चल पड़ती। फिर चाहे कितनी भी वर्जनाएँ हों मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता। बस अपने इसी स्वभाव के वशीभूत मेरी कश्मीर यात्रा आरम्भ हो गई।
इकबाल हमेशा कहता रहता था कि कश्मीर का कोई मुकाबला नहीं है। मैं भी सोचती थी कि सारी दुनिया ही कश्मीर की प्रशंसक है तो फिर इकबाल का तो वहाँ पर घर ही है। मेरे साथ इकबाल के रहते मुझे क्या परेशानी हो सकती है? लेकिन मुझे नहीं पता था कि इकबाल स्वयं ही बात-बात में डरता है। उसने मुझे एक भी साड़ी कश्मीर के लिए नहीं रखने दी। और तो और मेरे कानों में पहने हुए टॉप्स पर लगी ज़ंजीर भी उसने उतरवा दी। मैं जितने दिन कश्मीर में रही मुझे सलवार-कमीज़ से ही काम चलाना पड़ा। वैसे उसके डरने में मुझे उस समय कुछ भी अनुचित नहीं लगा क्योंकि आतंकवाद का दौर तो था ही।
   हाँ! तो हम जम्मू बस अड्डे पर पहुँचे तो सुबह के आठ बजने वाले थे। वहाँ से श्रीनगर के लिए बसें भी चलती थीं और टाटा सूमो टैक्सियाँ भी। बसों का किराया अवश्य ही कम था परन्तु वे शाम छः बजे के बाद ही श्रीनगर पहुँचातीं और इन हालात में हमें रात श्रीनगर गुज़ारनी पड़ती। टाटा सूमो का किराया कुछ अधिक था परन्तु वे तीन-चार बजे के बीच श्रीनगर पहुँचा देतीं जिससे हम बारामूला के लिए बस पकड़ सकते थे और रात होने से पहले इकबाल के घर पहुँच जाते सो हमने टाटा सूमो में जाने का फैसला लिया।
जिस सूमो में हम सवार हुए उसमें आगे की सीटों पर कुछ पुलिस के लोग बैठे थे, इसलिए हम सब पीछे वाले केबिन में बैठ गए। हमारे साथ कुछ हिमाचली लड़कियाँ भी बैठी थीं, जिन्हें टीचर ट्रेनिंग के लिए श्रीनगर जाना था। कुछ सैनिक थे जो वापस अपनी ड्यूटी पर जा रहे थे। रास्ते के लिए अच्छा गप्पबाजी का सामान हो गया। जम्मू से निकलने पर कुछ ही देर बाद पहाड़ी सिलसिला शुरू हो गया और ऊधमपुर तक आते-आते तो बाकायदा ठीक-ठाक पहाड़ ही दिखाई देने लगे। क्योंकि मैं हिमाचल के दुर्गम और ऊँचे पहाड़ों की रहने वाली हूँ इसलिए मुझ पर इन रूखी पहाड़ियों ने कोई प्रभाव नहीं डाला और मैं उन लड़कियों से बातों में उलझ गई।
सूमो में बैठे पुलिस विभाग के अधिकारी अपने अधिकारियों पर टिप्पणियाँ कर रहे थे तो सैनिक अपने अधिकारियों की छीछालेदर करते-करते सरकारी नीतियों की आलोचना पर उतर आए। सब के सब सरकारी नीतियों से असंतुष्ट थे तो हिमाचली लड़कियाँ जो अपने-अपने क्षेत्र में शिक्षिकाएँ भी थीं, अपने कश्मीरी छात्रों के अभद्र और उद्दण्ड व्यवहार से खिन्न थीं। उनका कहना था कि कश्मीरी छात्र राष्ट्रगान के समय पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाने लगते हैं। उन्हें अनुशासन में रखना बहुत कठिन हो जाता है।
दस बजे के करीब सूमो एक ढाबे पर रुक गई। नाश्ता तो करना ही था। टैक्सी से उतरकर मैं आगे-पीछे के दृश्यों में कुछ नयापन तलाशती रही परन्तु मुझे कहीं कुछ भी नया नज़र नहीं आ रहा था जिससे इकबाल कुछ चिढ़ने सा लगा था। काफ़ी सफर तय करने के बाद ही वह रोमांचक घड़ी आई जिसकी स्मृति सदा ही बनी रहेगी। यह थी वह सुरंग, जिसे पार करने के बाद जम्मू का इलाका खत्म होकर कश्मीर शुरू हो जाता था। यह मेरे जीवनकाल में देखी गई सबसे लम्बी सुरंग थी जो शायद 1430 मीटर लम्बी थी सच में बहुत ही रोमांचक लगी। सुरंग में दाखिल होने से पहले इकबाल ने मुझे बताया कि यह सुरंग जम्मू को कश्मीर से अलग करती है।
यहाँ हमें रोक लिया गया। कुछ पुलिस अधिकारी और जवान गाड़ी में चढ़ आए उन्होंने हम सब का सामान चैक किया। हम लोगों को गाड़ी से नीचे उतरना पड़ा क्योंकि वहाँ पर हमारी शारीरिक तलाशी होनी थी। दो केबिन बने हुए थे वहाँ, एक महिलाओं के लिए और दूसरा पुरुषों के लिए। मैं जिस केबिन में गई वहाँ पुलिस की वर्दी में 30/35 वर्ष की एक सुन्दर कश्मीरी महिला बैठी हुई थी। पर्स की तलाशी लेते वक्त उसे मेरी बड़ी सी डायरी दिखाई दी तो वह चौंक गई और बड़े-बड़े सवाल करने लगी। उसे लगा कि मैं पत्रकार हूँ, (इकबाल ने मुझे पहले ही सावधान कर दिया था।) लेकिन मैंने इससे इनकार किया और उसे बताया कि मैं उर्दू शायर हूँ, क्योंकि कुछ ग़ज़लें डायरी में उर्दू में भी लिखी हुई थीं। उसने डायरी में उर्दू में लिखी मेरी ग़ज़लें तो पढ़ीं लेकिन शायद उसे विश्वास नहीं आया या फिर हो सकता है, उसे शायरी से सचमुच ही लगाव रहा हो क्योंकि वह मुझसे शेर सुनाने की ज़िद करने लगी। बाहर इकबाल चिल्ला रहा था और भीतर वह महिला जाने ही नहीं दे रही थी। अतः एक-दो शेर सुनाकर मैंने उस से जान छुड़ाई और तुरन्त वापस आकर सूमो में बैठ गई।
इकबाल का मूड खराब हो चुका था। वह कह रहा था कि ‘‘ये सी.आइ.डी. वाले हैं, आप को पता भी नहीं चलेगा कि आप कब कानून की पकड़ में आ गई हैं।’’ लेकिन मैं सोच रही थी कि मैं कोई गैरकानूनी काम करूँगी तब न पकड़ में आऊँगी। ऐसे ही कैसे कोई मुझे कानून में लपेट लेगा। इकबाल बराबर बोले जा रहा था परन्तु अब हम सुरंग में प्रवेश कर चुके थे अतः उसके घुटन भरे वातावरण ने उसे चुप करा दिया था। जी हाँ! सुरंग में थोड़ी सी दूरी तय करने के बाद ही घुटन होने लगी थी, लेकिन ज्यादा नहीं।
रामबाग पहुँकर हम लोगों ने खाना खाया। बड़ी मुश्किल मेरे लिए हो जाती है कि पहाड़ में हर जगह ही दाल-भात का भोजन करना पड़ता है, जो मेरे लिए किसी मुहिम से कम नहीं। जगह अच्छी थी, पहाड़ थे सो, थोड़ा सा अपनापन लगा। लड़कियाँ शायद रात को शिमला से चली थीं इसलिए वे घर से खाना बनवाकर लाई थीं। मुझे भी वीना ने कुछ मिठाई और पूरी वगैरह दी थी, उसे पता था कि मैं चावल नहीं खा सकती लेकिन इकबाल ने चावल ही खाए। वहाँ एक बड़ा सा ढाबा था जिसके सामने और कई गाड़ियाँ खड़ी थीं। कुछ बसों का वहाँ रात्रि पड़ाव भी था। खाना खाकर हमलोग आगे चल पड़े। रास्ते के दोनों ओर मजनू के वृक्ष अपनी लम्बी और बेलनुमा टहनियों से धरती माँ को प्रणाम कर रहे थे। इकबाल ने मुझे बताया कि इस पेड़ की लकड़ी से क्रिकेट खेलने के बैट बनते हैं।
 मैंने एक पेड़ अपने गाँव में भी मजनू का देखा था परन्तु जिसने उसे लगाया था शायद वह भी उसका नाम नहीं जानता था और न ही उसकी उपयोगिता के बारे में जानता होगा अन्यथा वहाँ भी घर-घर इसके पेड़ होते। आखिर धन कमाना कौन नहीं चाहता? यहाँ तो पूरे रास्ते लगभग हर घर के सामने बने-अधबने क्रिकेट बैट भारी मात्रा में सलीके से चट्टे (चौकोर ढेर) लगाकर रखे हुए थे।
हम चार बजे श्रीनगर पहुँच गए। नगर में प्रवेश करके, नदी पर बने हुए लकड़ी के पुल पर से गुजरते हुए हमें यत्र-तत्र छोटे शिकारे नज़र आए। पता चला कि यदि हम रात को पहुँचते तो हमें पाँच बजे के बाद कोई बस बारामूला के लिए नहीं मिलती और तब हमें यहीं, इन्हीं शिकारों में रात गुजारनी पड़ती जिसके बारे में सोचकर भी झुरझुरी हो आती है क्योंकि नदी में पानी तो नाम मात्र को था परन्तु स्थान-स्थान पर पॉलीथिन और कचरे के ढेर नदी को घिनोना बना रहे थे। बस अड्डे पर भी शेष भारत के किसी अन्य छोटे कस्बे जैसा ही दृश्य उपस्थित था। कहीं भी-कुछ भी तो नया नहीं था।
   हम थक चुके थे और बारामूला की आखिरी बस छूटने का भय था। बस तैयार खड़ी थी कुछ सीटें अभी बाकी बची हुई थीं सो हमें सीट भी मिल गई और हम आधे घण्टे बाद इकबाल के घर दिलना पहुँच गए। जहाँ उसकी माँ और भाइयों ने मेरा भरपूर स्वागत किया।  डॉक्टर इकबाल ने घर पहुँचते ही अपनी माँ और भाभी को बता दिया था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ और घास-पात ही खाती हूँ इसलिए मेरे लिए पनीर की सब्जी बनाई गई। अभी हम लोग चाय ही पी रहे थे कि पड़ौस में कहीं से औरतों के गाने की आवाज़ें आने लगी। थोड़ी ही देर में लोग हमें बुलाने भी आ गए। कैसे उन लोगों को पता चला होगा कि कोई मेहमान आए हैं। गाँव में ज़कात (भण्डारा) थी। दो ख़ूबसूरत औरतें मेरे पास आईं, कहने लगीं, ‘‘गाय नहीं बनी है। आप चलिए।’’ इकबाल ने हँस कर कहा कि ‘‘ये तो घास खाती हैं, तुम किसी दिन घास बना कर इन्हें बुला लेना।’’ उस दिन तो वे औरतें मायूस होकर चली गईं, लेकिन जब तक हम वहाँ रहे हर दिन किसी न किसी घर से बुलावा आता रहा और हम चाय की दावत कुबूल करते रहे। ख़ास बात यह कि बारमूला के हर घर में बेकरी में बनी चीज़ों का प्रयोग अवश्य ही होता है। लोग घरों में कुछ नहीं बनाते। वहाँ दिलना और बारामूला में कुछ शायरों से भी मेरी मुलाकात हुई। मैं जिस घर में भी जाती लोग मुझसे ग़ज़ल की फरमाइश ज़रूर करते थे।
एक दिन इकबाल मुझे किसी शायर के घर ले गया। मेरे मना करने पर बोला, ‘‘बड़े अच्छे शायर हैं। आप को उनसे मिलकर खुशी होगी जब से उन्हें पता चला है कि हमारे घर में कोई शाइरा आई हैं तभी से वे मुझे कह रहे हैं आप को लाने के लिए।
बाद दोपहर तीन बजे के करीब हम उनके घर चले गए। वे अपने इलाके में बी.डी.ओ. थे। बड़ा सुन्दर घर बनाया हुआ था लेकिन दिलना के हर घर की तरह वहाँ भी बैठने का इन्तज़ाम ज़मीन पर ही था। पहले तो हमें उन्होंने बैठक में बैठाया जहाँ कुर्सियाँ और सोफ़े लगे हुए थे फिर शायद वे असहज अनुभव करने लगे तो बोले ‘‘चलिए आराम से अन्दर बैठा जाए।’’ अब हम जहाँ पहुँचे वह एक बड़ा हाल कमरा था। बिना किसी तरह के फर्नीचर के ख़ूबसूरत कीमती कालीन पर दीवार के सहारे-सहारे गाव तकिए लगे हुए थे।
अब जो हमज़ौक लोग बैठे हैं तो कुछ हमसे सुना गया और कुछ उन्होंने सुनाया। वक्त का पता ही न चला। इकबाल बेचैन होने लगा तो मुझे भी आज्ञा लेने की याद आई। बाहर निकल कर देखा, अँधेरा होने लगा था। पूरे घर से विदा लेते-लेते कुछ और समय लग गया। उनका घर नज़र से ओझल होते ही इकबाल ने बौखलाना शुरू कर दिया, ‘‘जल्दी चलो, आपको पता ही नहीं है कुछ भी।’’
मैं कुछ कहने ही चली थी कि उसने मुँह पर अँगुली रखकर धीरे से ‘शी’ की आवाज़ निकाली और मेरा बाज़ू पकड़ कर घसीटने लगा। जल्दी ही हम सड़क पर थे। उसने पलभर रुक कर चारों तरफ़ देखा फिर इत्मीनान की साँस लेकर बोला ‘चलो।’ और मेरा बाजू पकड़कर लगभग घसीटता हुआ सड़क पार कर गया।
अब उसने मेरा बाज़ू छोड़ दिया और एक लम्बा गहरा साँस लेकर बोला, ‘‘पता है, हम जहाँ से गुज़र रहे थे वह एक ख़ूंखार आतंकवादी का घर था। अगर वह आपको देख लेता तो ग़ज़ब हो जाता। वह भी उस सुरंग वाली सी.आइ.डी. की तरह ही समझता कि आप रात को इधर से क्यों गुज़र रही हैं।’’ ख़ैर अब हम घर के पास थे और इकबाल पूरी तरह से निश्चिंत था।
मैं वहाँ पूरा एक महीना रही। मैं थोड़ी-थोड़ी कश्मीरी ज़बान भी समझने लगी थी। जैसे दही को ज़मदुद कहा जाता है, पानी को त्रा और प्यास को त्रोश। इकबाल की माँ मुझे हर रोज़ कलमा पढ़ाने की कोशिश करती थी। मैं सोचती थी कि हमारे यहाँ कोई मुसलमान आए तो हम उसे कभी भी गीता पढ़ने को क्यों नहीं कहते? पर हाँ, यह बिल्कुल सच है हम किसी को नहीं कहते कि वह गीता या रामायण पढ़े। पूरा एक महीना दिलना रहने के दौरान श्रीनगर की डलझील, गुलमर्ग और बहुत सी सूफ़ी संतों की दरगाहों के साथ-साथ मैंने जिस कश्मीर को जाना-समझा वह न तो भारत के साथ कोई समझौता करने के लिए तैयार दिखाई दिया और न ही वह अपने आप को भारत का हिस्सा मानता है। अगर मैं यह कहूँ कि कश्मीर अलगाववादियों की आड़ में पाकिस्तान के हाथों में खेल रहा हैं और भारत को भावनात्मक त्रास देकर उसका दुरुपयोग कर रहा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि कश्मीरी नागरिक भारत की दी हुई हर सुविधा का उपयोग करना और प्रशासन को असफ़ल सिद्ध करने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते।
      मैंने देखा था़ वहाँ पर कोई बिजली का बिल नहीं देता और सरकार बिजली के कनैक्शन भी नहीं काटती जबकि किसी भी भारतीय नागरिक के समय पर बिल न अदा करने पर उसके  घर अथवा व्यवसायिक संस्थान के तार काट दिए जाते हैं सज़ा अलग से मिलती है। यहाँ हर घर में रोशनी के लिए गैस के छः सात छोटे सिलेंडर होते हैं, जो महीनों विद्युत आपूर्ति के न होने पर भी नागरिकों को असुविधा अथवा अभाव नहीं होने देते। स्थानीय बसों में कण्डेक्टर के पास टिकट नहीं होते। जन साधरण पैसा अवश्य देते हैं और जवान लड़के-लड़कियाँ तो कई बार कण्डेक्टर को धमका भी देते हैं और पैसा नहीं देते। जब टिकट ही नहीं छपेंगे तो सरकार को टैक्स कौन देगा? इसी तरह सरकारी बैंकों ;भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नैशनल बैंक, यू.को. बैंक आदिद्ध में कश्मीरी लोग अपना खाता नहीं खोलते। कश्मीरी जनता का सारा धन जम्मू-कश्मीर बैंक में जाता है। सरकारी बैंक मात्र वेतन देने के लिए हैं। वहाँ कोई आकाशवाणी और दूरदर्शन की ओर आकर्षित नहीं है। जब कभी घण्टे-आधे घण्टे के लिए बिजली आती है तो लोग पाकिस्तान टी.वी. या पाकिस्तान रेडियो सुनते हैं।
मुझे वह घटना भी नहीं भूलती जब मैं आकाशवाणी श्रीनगर में रिकार्डिंग के लिए गई थी। इक़बाल मुझे आकाशवाणी छोड़कर किसी मित्र से मिलने चला गया था। उसे अन्दर नहीं जाने दिया गया था। उसने कहा था, ‘‘बाहर गेट के पास रहना मैं दो घण्टे में आपको लेने आ जाऊँगा।’’  रिकार्डिंग के बाद मैं बाहर आई तो इक़बाल अभी नहीं पहुँचा था। मुझे इन्तज़ार करना था। मैं गेट के पास खड़ी हो गई। दायें-बायें हो जाने से इक़बाल को मुझे तलाश करना पड़ सकता था।
गेट पर दोनों ओर मोर्चे बने हुए थे। रेत के भरे बोरे रखे थे और बंदूकधारी सिपाही उनके पीछे खड़े थे। ऐसा हर आकाशवाणी केंद्र पर तो नहीं होता परन्तु वहाँ यह व्यवस्था सम्भवतया सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक थी। थोड़ी देर तो मेंमैं इध्रर उधर टहलती रही। सिपाही भी मुझे देख रहे थे, फिर एक सिपाही मेरे पास आ गया। मुझसे उसने वहाँ टहलने का कारण पूछा, तो मैंने सारी बात उसे बता दी। वह बोला तो मैंने उससे तुरन्त ही पूछ लिया,
‘‘आप हिमाचल के हो क्या? मैं भी हिमाचल की ही हूँ। मैंने आपकी भाषा को पहचान लिया है।’’
‘‘हाँ! काँगड़ा का हूँ, इधर चलिए।’’ मेरे उसके इंगित स्थान पर जाने से वह कुछ आश्वस्त तो हुआ परन्तु फिर बेचैन होकर कहने लगा, ‘‘मैं आपके साथ अधिक बात नहीं कर सकता क्योंकि इससे आपको खतरा हो सकता है।’’
‘‘क्या खतरा हो सकता है मुझे?’’
‘‘आप समझ नहीं रही हैं, यहाँ तो दिन रात यही होता है, कहीं से कोई गोली आएगी जो हमारे लिए होगी और आप हमारे साथ हैं इसलिए वह गोली आपके लिए भी हो सकती है। मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ आप वहाँ, उस पेड़ के पास खड़े रह कर इन्तज़ार कर लीजिए।’’ इतना कह कर वह मुड़ कर चला गया और पुनः अपने मोर्चे पर खड़ा हो गया। मैं अक्सर ही सोचती हूँ कि हम किस कश्मीर को अपना कह रहे हैं? और हमारे नेता आखिर हमारी आने वाली नस्लों के लिए क्या सोच रहे हैं और क्या चाहते हैं? 

— आशा शैली

*आशा शैली

जन्मः-ः 2 अगस्त 1942 जन्मस्थानः-ः‘अस्मान खट्टड़’ (रावलपिण्डी, अब पाकिस्तान में) मातृभाषाः-ःपंजाबी शिक्षा ः-ललित महिला विद्यालय हल्द्वानी से हाईस्कूल, प्रयाग महिलाविद्यापीठ से विद्याविनोदिनी, कहानी लेखन महाविद्यालय अम्बाला छावनी से कहानी लेखन और पत्रकारिता महाविद्यालय दिल्ली से पत्रकारिता। लेखन विधाः-ः कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल, शोधलेख, लघुकथा, समीक्षा, व्यंग्य, उपन्यास, नाटक एवं अनुवाद भाषाः-ः हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, पहाड़ी (महासवी एवं डोगरी) एवं ओडि़या। प्रकाशित पुस्तकंेः-1.काँटों का नीड़ (काव्य संग्रह), (प्रथम संस्करण 1992, द्वितीय 1994, तृतीय 1997) 2.एक और द्रौपदी (काव्य संग्रह 1993) 3.सागर से पर्वत तक (ओडि़या से हिन्दी में काव्यानुवाद) प्रकाशन वर्ष (2001) 4.शजर-ए-तन्हा (उर्दू ग़ज़ल संग्रह-2001) 5.एक और द्रौपदी का बांग्ला में अनुवाद (अरु एक द्रौपदी नाम से 2001), 6.प्रभात की उर्मियाँ (लघुकथा संग्रह-2005) 7.दादी कहो कहानी (लोककथा संग्रह, प्रथम संस्करण-2006, द्वितीय संस्करण-2009), 8.गर्द के नीचे (हिमाचल के स्वतन्त्रता सेनानियों की जीवनियाँ-2007), 9.हमारी लोक कथाएं भाग एक से भाग छः तक (2007) 10.हिमाचल बोलता है (हिमाचल कला-संस्कृति पर लेख-2009) 11. सूरज चाचा (बाल कविता संकलन-2010) 12.पीर पर्वत (गीत संग्रह-2011) 13. आधुनिक नारी कहाँ जीती कहाँ हारी (नारी विषयक लेख-2011) 14. ढलते सूरज की उदासियाँ (कहानी संग्रह-2013) 15 छाया देवदार की (उपन्यास-2014) 16 द्वंद के शिखर, (कहानी संग्रह) प्रेस में प्रकाशनाधीन पुस्तकेंः-द्वंद के शिखर, (कहानी संग्रह), सुधि की सुगन्ध (कविता संग्रह), गीत संग्रह, बच्चो सुनो बाल उपन्यास व अन्य साहित्य, वे दिन (संस्मरण), ग़ज़ल संग्रह, ‘हण मैं लिक्खा करनी’ पहाड़ी कविता संग्रह, ‘पारस’ उपन्यास आदि उपलब्धियाँः-देश-विदेश की पत्रिकाओं में रचनाएँ निरंतर प्रकाशित, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के विभिन्न केन्द्रों से निरंतर प्रसारण, भारत के विभिन्न प्रान्तों के साहित्य मंचों से निरंतर काव्यपाठ, विचार मंचों द्वारा संचालित विचार गोष्ठियों में प्रतिभागिता। सम्मानः-पत्रकारिता द्वारा दलित गतिविधियों के लिए अ.भा. दलित साहित्य अकादमी द्वारा अम्बेदकर फैलोशिप (1992), साहित्य शिक्षा कला संस्कृति अकादमी परियाँवां (प्रतापगढ़) द्वारा साहित्यश्री’ (1994) अ.भा. दलित साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा अम्बेदकर ‘विशिष्ट सेवा पुरुस्कार’ (1994), शिक्षा साहित्य कला विकास समिति बहराइच द्वारा ‘काव्य श्री’, कजरा इण्टरनेशनल फि़ल्मस् गोंडा द्वारा ‘कलाश्री (1996), काव्यधारा रामपुर द्वारा ‘सारस्वत’ उपाधि (1996), अखिल भारतीय गीता मेला कानपुर द्वारा ‘काव्यश्री’ के साथ रजत पदक (1996), बाल कल्याण परिषद द्वारा सारस्वत सम्मान (1996), भाषा साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा ‘साहित्यश्री’ (1996), पानीपत अकादमी द्वारा आचार्य की उपाधि (1997), साहित्य कला संस्थान आरा-बिहार से साहित्य रत्नाकर की उपाधि (1998), युवा साहित्य मण्डल गा़जि़याबाद से ‘साहित्य मनीषी’ की मानद उपाधि (1998), साहित्य शिक्षा कला संस्कृति अकादमी परियाँवां से आचार्य ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी’ सम्मान (1998), ‘काव्य किरीट’ खजनी गोरखपुर से (1998), दुर्गावती फैलोशिप’, अ.भ. लेखक मंच शाहपुर (जयपुर) से (1999), ‘डाकण’ कहानी पर दिशा साहित्य मंच पठानकोट से (1999) विशेष सम्मान, हब्बा खातून सम्मान ग़ज़ल लेखन के लिए टैगोर मंच रायबरेली से (2000)। पंकस (पंजाब कला संस्कृति) अकादमी जालंधर द्वारा कविता सम्मान (2000) अनोखा विश्वास, इन्दौर से भाषा साहित्य रत्नाकर सम्मान (2006)। बाल साहित्य हेतु अभिव्यंजना सम्मान फर्रुखाबाद से (2006), वाग्विदाम्बरा सम्मान हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से (2006), हिन्दी भाषा भूषण सम्मान श्रीनाथद्वारा (राज.2006), बाल साहित्यश्री खटीमा उत्तरांचल (2006), हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा महादेवी वर्मा सम्मान, (2007) में। हिन्दी भाषा सम्मेलन पटियाला द्वारा हज़ारी प्रसाद द्विवेदी सम्मान (2008), साहित्य मण्डल श्रीनाथद्वारा (राज.) सम्पादक रत्न (2009), दादी कहो कहानी पुस्तक पर पं. हरिप्रसाद पाठक सम्मान (मथुरा), नारद सम्मान-हल्द्वानी जिला नैनीताल द्वारा (2010), स्वतंत्रता सेनानी दादा श्याम बिहारी चैबे स्मृति सम्मान (भोपाल) म.प्रदेश. तुलसी साहित्य अकादमी द्वारा (2010)। विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा भारतीय भाषा रत्न (2011), उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा सम्मान (2011), अखिल भारतीय पत्रकारिता संगठन पानीपत द्वारा पं. युगलकिशोर शुकुल पत्रकारिता सम्मान (2012), (हल्द्वानी) स्व. भगवती देवी प्रजापति हास्य-रत्न सम्मान (2012) साहित्य सरिता, म. प्र. पत्रलेखक मंच बेतूल। भारतेंदु साहित्य सम्मान (2013) कोटा, साहित्य श्री सम्मान(2013), हल्दीघाटी, ‘काव्यगौरव’ सम्मान (2014) बरेली, आषा षैली के काव्य का अनुषीलन (लघुषोध द्वारा कु. मंजू षर्मा, षोध निदेषिका डाॅ. प्रभा पंत, मोतीराम-बाबूराम राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय हल्द्वानी )-2014, सम्पादक रत्न सम्मान उत्तराखण्ड बाल कल्याण साहित्य संस्थान, खटीमा-(2014), हिमाक्षरा सृजन अलंकरण, धर्मषाला, हिमाचल प्रदेष में, हिमाक्षरा राश्ट्रीय साहित्य परिशद द्वारा (2014), सुमन चतुर्वेदी सम्मान, हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा (2014), हिमाचल गौरव सम्मान, बेटियाँ बचाओ एवं बुषहर हलचल (रामपुर बुषहर -हिमाचल प्रदेष) द्वारा (2015)। उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रदत्त ‘तीलू रौतेली’ पुरस्कार 2016। सम्प्रतिः-आरती प्रकाशन की गतिविधियों में संलग्न, प्रधान सम्पादक, हिन्दी पत्रिका शैल सूत्र (त्रै.) वर्तमान पताः-कार रोड, बिंदुखत्ता, पो. आॅ. लालकुआँ, जिला नैनीताल (उत्तराखण्ड) 262402 मो.9456717150, 07055336168 asha.shaili@gmail.com