मुक्तक/दोहा

समकालीन हिंदी दोहे

ढाई आखर ने सदा,रचा विश्व भूगोल।
प्रेम यही तो पढ़ सका पूरी पृथ्वी गोल।।

दूर सदा उससे रहो, पड़े जो भोग विलास।
मेहनत की कीमत सदा,रखो अपने पास।।

रूप रंग दौलत हमें कर देता मगरूर।
वक्त पलटता फैसला,कर देता सब चूर।।

मन की बगिया में सदा,खिले गुलाबी फूल।
यादों की मधुगंध में, नहीं चुभे बन शूल।।

महलों में है मौज सब,लूटे सबके ठौर।
झोपड़ियां सूनी पड़ी, भूखें प्यासे दौर।।

प्रकृति रचाती दृश्य है, दृश्यों से भरपूर।
जिया -मरण की बात को रखती सबसे दूर।।

बातें जो लाये सदा अधरों पर मुस्कान।
मीठी बोली में बसे, धरती और ज़हान।

तरुवर से फल मिल रहे नदियां देती नीर।
अगर प्रकृति पीछे पड़ी देगी सबको पीर।।

पूरी कैसे हो सके इनकी – उनकी आस।
आखिर तो कैसे मिटे पानी जैसी प्यास।।

— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

द्वारा विद्या रमण फाउण्डेशन 121, शंकर नगर,मुराई बाग,डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207 M-9670040890

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