कविता

अपनी वाह-वाह

दूसरों की आज करता है कौन परवाह,
धुंआधार बस बढ़ती रही जा रही चाह,
दिलों में नहीं है उजाला अहम है बसा,
सभी को चाहिए बस अपनी वाह-वाह ।

अपनों से रूठे बैठे हैं घरों में आज लोग,
लगा है बाहरी प्रशंसा का उन्हें गज़ब रोग,
रिश्तों में तनातनी का शिकंजा है कसा,
चला है आज ये कैसा चलन कैसा भोग ।

बोलते हैं बाहर बड़े ही मिश्री से भरे बोल,
बजाते हैं घरों में पर तानाशाही का ढोल,
दूसरों की हार पर खूब करतें हैं जलसा,
भूल ही बैठे हैं पैतृक संस्कारों का मोल ।

घावों पर छिड़कते जा रहे बिंदास नमक,
छूना चाहते हैं महत्वाकांक्षाओं का फलक,
मन-मस्तिष्क पर मोह ने डाला है शिंकजा,
सर चढ़ी बनावटी जीवन की चमक-दमक ।

मिलेंगे ऐसे उदाहरण आस-पास ही हज़ारों,
तन-मन की स्वास्थ्य शांति में हैं जो ज़ीरो,
“आनंद” ईश्वर तो इनकी करतूतों पर हैं हॅंसा,
बनते फिर रहे हैं फिर भी ये दुनिया में हीरों ।

— मोनिका डागा “आनंद”

मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु

Leave a Reply