होली और दिवाली
खाली घर खाने को दौड़ता है अब
कभी यहाँ हलचल थी
आज सन्नाटा है पसरा
रोनकों का दौर भी खत्म हो गया
न आने को कोई राजी
न ही कोई जाने को
यह तो बात बच्चों और रिश्तेदारों की है
पत्नी और पति भी हाथ में मोबाइल लिए
पीठ किये लेटे हैं
त्यौहार वहीं हैं पर खाली खाली
महकती थी जो खुश्बू पकवानों की नदारद है
बाजार भरे पड़े हैं पकवानों से
खरीद ले आओ दो ढाई सो ग्राम
खुद मिल जुल दोनों ने ही तो खाने हैं
पहले जैसे तो नही घर
भरा रहता था भाई बहनों और बच्चों से
अब तो रंजिसे हैं आपस में
कौन आये जाये एक दूसरे के घर
बाहर चेहरे पर हैं फूलझड़ियाँ
मन अंदर से उदास है
यह कोई कविता नहीं यथार्थ है
