कविता

सद्भाव

स्वार्थों को साध सका ना
कष्टों की माला पहनी
आजाद मन पंछी
दुनियादारी निभा सका ना ।

हृदयप्रीत सदा रही भरपूर
हृदय भाव दिखा सका ना
संसार में हुआ मशहूर
अपनों से मिला अपमान सह सका ना ।

तन -मन हुआ बीमार
सांस -सांस है अटकी
ए मनुज ! मानवता क्यों रही हार
सब जिंदगी जी रहे भटकी- भटकी ।

टूटे मन को फिर से जोड़ें
चलो साथ मिलकर ढूंढे प्रीत
द्वेष की दीवार मिलकर तोड़ें
चलो सद्भाव की चलायें रीत।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111