राजनीति

शक्ति, संघर्ष और शांति : संयुक्त राष्ट्र की शिथिल होती भूमिका

7 मार्च 2026 को मध्य-पूर्व एक बार फिर बड़े सैन्य संघर्ष की आग में जलता दिखाई दे रहा है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है। तेहरान पर अमेरिकी और इजराइली हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल और खाड़ी क्षेत्र के कई देशों पर मिसाइलें और ड्रोन दागे। इस व्यापक संकट के बीच दुनिया की निगाहें स्वाभाविक रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ओर उठीं, क्योंकि वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी उसी संस्था के कंधों पर है। किंतु सुरक्षा परिषद की आपात बैठकों और कड़े बयानों के बावजूद संघर्ष को रोकने में कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। इस स्थिति ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या संयुक्त राष्ट्र वास्तव में अपना महत्व खो चुका है।
फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ एक बड़े सैन्य अभियान की शुरुआत की। इस अभियान में ईरान की परमाणु सुविधाओं, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के ठिकानों को निशाना बनाया गया। हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव तेजी से बढ़ा। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल के साथ-साथ उन खाड़ी देशों पर भी हमले किए जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं। बहरीन के तेल शोधन संयंत्र पर हमले सहित कई घटनाओं ने इस संघर्ष को और गंभीर बना दिया। इन हमलों में बड़ी संख्या में नागरिकों की मृत्यु की खबरें भी सामने आईं, जिनमें स्कूलों और नागरिक ढांचे पर हुए हमले शामिल हैं।
इस स्थिति के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई गई। महासचिव एंतोनियो गुतेरेस ने कहा कि किसी भी देश द्वारा दूसरे देश की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ बल प्रयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और इससे वैश्विक शांति को खतरा पैदा होता है। लेकिन इन चेतावनियों का वास्तविक घटनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हमले जारी रहे और संघर्ष और गहराता गया। यह स्थिति संयुक्त राष्ट्र की उस संरचनात्मक कमजोरी को उजागर करती है, जो उसकी स्थापना के समय से ही मौजूद है।
संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी सुरक्षा परिषद में मौजूद वीटो की व्यवस्था है। अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस – इन पांच स्थायी सदस्यों के पास किसी भी प्रस्ताव को रोकने की शक्ति है। जब किसी संघर्ष में इन देशों में से कोई स्वयं पक्ष बन जाता है, तब सुरक्षा परिषद की प्रभावी कार्रवाई लगभग असंभव हो जाती है। ईरान पर हमले के मामले में भी यही स्थिति देखने को मिली। अमेरिका स्वयं इस सैन्य कार्रवाई का हिस्सा था, इसलिए उसके खिलाफ कोई बाध्यकारी प्रस्ताव पारित होना संभव नहीं था। परिणामस्वरूप परिषद में बहस तो हुई, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका।
यह स्थिति नई नहीं है। इससे पहले रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी संयुक्त राष्ट्र इसी प्रकार की असहायता का प्रदर्शन कर चुका है। रूस के खिलाफ प्रस्ताव बार-बार उसके वीटो के कारण रुकते रहे। इसी प्रकार गाजा संघर्ष और अन्य कई अंतरराष्ट्रीय संकटों में भी वीटो की राजनीति ने संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी कदम उठाने से रोका है। इस कारण कई आलोचक यह तर्क देते हैं कि संयुक्त राष्ट्र वास्तव में वैश्विक शांति बनाए रखने के अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में असफल रहा है।
ईरान संकट के दौरान अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या को लेकर भी विवाद सामने आया। अमेरिका ने अपने हमलों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत आत्मरक्षा का अधिकार बताते हुए उचित ठहराया। दूसरी ओर ईरान और कई अन्य देशों ने इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 का उल्लंघन बताया, जिसमें बल प्रयोग पर प्रतिबंध की बात कही गई है। यह स्थिति दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या अक्सर शक्तिशाली देशों के हितों के अनुसार की जाती है। जब सबसे ताकतवर देश ही नियमों की अलग-अलग व्याख्या करने लगें, तो किसी निष्पक्ष वैश्विक व्यवस्था की संभावना कमजोर पड़ जाती है।
मध्य-पूर्व का यह संकट केवल सैन्य संघर्ष तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। होर्मुज जलसंधि के आसपास तनाव बढ़ने से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका पैदा हो गई है, क्योंकि दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है। तेल की कीमतों में तेजी से वृद्धि होने लगी है। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र इस संकट को नियंत्रित करने में प्रभावी भूमिका निभाने में असमर्थ दिखाई देता है।
संयुक्त राष्ट्र की सीमाएं केवल वर्तमान संकट तक सीमित नहीं हैं। इतिहास में भी कई ऐसे अवसर आए हैं जब यह संस्था बड़े मानवीय संकटों को रोकने में विफल रही। 1994 के रवांडा नरसंहार में लाखों लोगों की हत्या के समय संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता की तीखी आलोचना हुई थी। इसी प्रकार सीरिया के गृहयुद्ध, यूक्रेन संकट और गाजा संघर्ष जैसे मामलों में भी संयुक्त राष्ट्र की भूमिका सीमित ही रही। इससे यह धारणा मजबूत होती गई कि जब बड़े देशों के हित टकराते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाता।
फिर भी यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुका है। वैश्विक स्तर पर कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां यह संस्था आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। विश्व खाद्य कार्यक्रम भूख से जूझ रहे देशों में राहत पहुंचाता है। यूनिसेफ बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए काम करता है। शरणार्थियों की सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त की संस्था सक्रिय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वैश्विक महामारी और स्वास्थ्य संकटों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार और विकास कार्यक्रमों जैसे क्षेत्रों में भी संयुक्त राष्ट्र का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं हुआ है। समस्या मुख्यतः उस क्षेत्र में है जिसके लिए इस संस्था की स्थापना की गई थी – अर्थात युद्ध को रोकना और वैश्विक शांति बनाए रखना। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र की सीमाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। जब शक्तिशाली देश स्वयं सैन्य कार्रवाई में शामिल हों, तब संयुक्त राष्ट्र के पास उन्हें रोकने के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं होता।
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस उद्देश्य से की गई थी कि आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विनाशकारी परिस्थितियों से बचाया जा सके। उस समय 51 देशों ने मिलकर इस संस्था की नींव रखी थी। आज इसके सदस्य देशों की संख्या 193 तक पहुंच चुकी है। लेकिन जैसे-जैसे विश्व व्यवस्था जटिल होती गई, संयुक्त राष्ट्र की निर्णय-प्रक्रिया भी अधिक कठिन होती गई। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ की प्रतिद्वंद्विता ने संयुक्त राष्ट्र को कई बार निष्क्रिय बना दिया। शीत युद्ध समाप्त होने के बाद कुछ समय के लिए उम्मीद जगी कि अब यह संस्था अधिक प्रभावी हो सकेगी, लेकिन इराक युद्ध और बाद के कई संघर्षों ने उस आशा को भी कमजोर कर दिया।
इसी कारण पिछले कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग उठती रही है। कई देश सुरक्षा परिषद की संरचना को बदलने और स्थायी सदस्यता का विस्तार करने की मांग करते हैं। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देशों का तर्क है कि वर्तमान सुरक्षा परिषद 1945 की शक्ति-संतुलन को दर्शाती है, जबकि आज की दुनिया में शक्ति संरचना बदल चुकी है। इसी तरह वीटो प्रणाली को समाप्त करने या सीमित करने का प्रस्ताव भी कई बार सामने आया है। लेकिन जिन देशों के पास वीटो की शक्ति है, वे इसे छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।
इस परिस्थिति में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका एक विरोधाभास बन जाती है। एक ओर यह संस्था वैश्विक संवाद और सहयोग का महत्वपूर्ण मंच है, दूसरी ओर जब सबसे बड़े संकट सामने आते हैं तब इसकी प्रभावशीलता सीमित दिखाई देती है। फिर भी यह भी सच है कि यदि संयुक्त राष्ट्र जैसा वैश्विक मंच न हो तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और अधिक अराजक हो सकती है। छोटे और विकासशील देशों के लिए यह मंच अपनी बात रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
अंततः कहा जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ है, लेकिन उसने वह प्रभाव और शक्ति अवश्य खो दी है जिसकी कल्पना उसके संस्थापकों ने की थी। आज यह संस्था युद्धों को रोकने में अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पा रही है। इसके बावजूद मानवीय सहायता, विकास कार्यक्रमों और वैश्विक सहयोग के क्षेत्रों में इसका महत्व अभी भी बना हुआ है।
दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप कैसे बनाया जाए। जब तक सुरक्षा परिषद की संरचना अधिक प्रतिनिधिक और लोकतांत्रिक नहीं बनती, जब तक वीटो की शक्ति सीमित नहीं होती और जब तक अंतरराष्ट्रीय कानून को लागू करने का प्रभावी तंत्र विकसित नहीं होता, तब तक संयुक्त राष्ट्र की भूमिका अधूरी ही बनी रहेगी।
मध्य-पूर्व का वर्तमान संकट एक बार फिर यह याद दिलाता है कि वैश्विक शांति केवल घोषणाओं और बैठकों से स्थापित नहीं हो सकती। इसके लिए ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें शक्ति के साथ-साथ न्याय और समानता का संतुलन भी मौजूद हो। संयुक्त राष्ट्र यदि स्वयं को इस दिशा में परिवर्तित कर पाता है तो वह भविष्य में फिर से प्रभावी हो सकता है। अन्यथा वह एक ऐसे मंच के रूप में रह जाएगा जो युद्धों पर चिंता तो व्यक्त करता है, लेकिन उन्हें रोकने की क्षमता नहीं रखता।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563