बुद्धिमान
समस्त जीवात्माओं में आदमी सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि प्रकृति ने उसे ही एक विलक्षण ऋधि प्रदान की है जिसे बुद्धि कहते हैं। वह सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक की उसकी विकास यात्रा बुद्धि के सतत प्रयोग से प्राप्त अनिर्वचनीय सिद्धि है । हमारे द्वारा किसी काम के प्रति, करने से पूर्व भली भाँति सोच लेना बुद्धिमत्ता है । वह काम करते करते भी दिमाग़ में कुछ खटका हुआ और सोच-विचार कर लिया तो उसे सतर्कता कह सकते हैं । वह बिना सोचे समझे काम प्रारम्भ कर दिया और सम्पन्न भी कर लिया फिर समझ में आया कि यह तो ग़लत हुआ तो उसे तो सरासर मूर्खता कहेंगे। बुद्धिमान वह है जो यह कहता है कि मैं तकलीफ़ों को आने से रोक तो नहीं सकता पर यह मेरा निर्णय है कि मेरे भाग्य में जब कभी कष्ट द्वार पर लायेगा तो उन्हें मेरे मन के मकान में अड्डा नहीं जमाने दूँगा। हमारे मन में जब प्रश्न पैदा होता हैं तो उत्तर की खोज भी होती हैं। उत्तर की खोज शुरू की जाती है तो यथोचित प्रयास से समाधान भी मिल जाता हैं । आदमी बुद्धि से काम लेता हैं तो कोई रास्ता भी मिल जाता हैं। आत्मा का दीपक बुद्धि है और अन्तर के सद्गुणों की सर्चलाईट सदबुद्धि है । मानवता का परम कर्तव्य है कि हम बुद्धिमत्ता पूर्वक अपने जीवन का उपयोग करें । वह इस अमूल्य निधि का हमसे कभी दुरुपयोग न हो । हमारी मति में असीम क्षमता है पर अफसोस ! नगण्य को ही यह ज्ञात है कि कैसे इसका उपयोग मानवीय प्रगति में करें । अतः अभीष्ट है हर मानव इस असीम ज्ञान के भण्डार का अधिकाधिक उपयोग ही नहीं , सदुपयोग करे , न केवल स्वयं के लिए, अपितु समग्र मानवता के कल्याण में योगभूत बने । हमारी इस दुनिया में सफलता के लिए बुद्धि का विकास होना बहुत जरूरी हैं । नंदी सूत्र में बुद्धि के अनेक प्रकार बतलाए गए है । औत्पत्तिकी , वैनयिकी , कार्मिकी, पारिणामिकी ये चार मुख्य प्रकार हैं । मनुष्य बुद्धि बल से बड़ी- बड़ी समस्याओं को पार कर देता हैं । बुद्धिहीन मानव उलझ जाता हैं । वह समस्या को नहीं सुलझा सकता हैं । वह सब लोगों में बुद्धि समान नहीं होती हैं । कहते हैं कि आचार्य भिक्षु में औत्पत्तिकी बुद्धि थी । औत्पत्तिकी बुद्धि वह हैं, जिसमें बाहर से नहीं भीतर से समाधान निकलता हैं । उसका तात्पर्य यह हैं कि आज तक जिसके बारे में सुना नहीं , जाना नहीं ,पढ़ा नहीं आदि आदि फिर भी उस विषय पर कोई प्रश्न आए तो उत्तर तत्काल तैयार होता हैं । इस बुद्धि से सम्पन्न बहुत कम लोग होते हैं किंतु अभ्यास के द्वारा बुद्धि का विकास करने वाले लोग हम देख सकते हैं । बुद्धिहीन आदमी कुछ कर नहीं पाते हैं और असफल हो जाते हैं । अगर कोई कहता है कि वह आज के मुक़ाबले कल अधिक बुद्धिमान था तो समझ लो वह आज भी उतना ही बुद्धिमान है जो इतना निर्णय कर सकता है।बुद्धि सफलता का द्वार हैं । विद्वता व बुद्धिमत्ता प्राप्त ज्ञान का लेकर उचित संज्ञान करना उसका समुचित उपयोग है ।यह तब होता है जब पुण्य कर्मों का हो सुयोग हो । वास्तविक विद्वता बिना मानवीय आचार और विनम्र व्यवहार उजागर नहीं होती हैं । विद्वान का प्रथम लक्षण है विद्वता के साथ इनसानियत हो। यह तभी हो सकता है जब पढ़ा है जो विद्या में वह दैनिक आचरण का आधार बने। हम समझें इनसान को सफल समय नहीं बनाता पर विद्वान विद्या का सही उपयोग कर प्रबल हो जाता है । सफलता के लिए बहुत आवश्यक बुद्धि हैं ।बोद्धिक विकास बहुत महत्वपूर्ण होता हैं । बुद्धि तजुर्बे के साथ बढ़ती है। वह जहां बोद्धिक विकास नहीं होता हैं, वहां कोई बड़ा काम नहीं हो सकता हैं । जीवन है तो उठा-पटक नदी-नाले हार-जीत के मार्ग अवरोधक आदि से सामना करना ही पड़ता है। बुद्धिमान वही हैं जो इससे विफल नहीं हो। वह शान्त-चित्त हर बाधा को दूर करे और उससे पाठ लेता हुआ आगे बढ़ता रहे।
— प्रदीप छाजेड़
