नफरतों की आँधी से डराने की कोशिश ठीक नहीं है
काली आँधी में
दीपक फिर भी जलता
हौसला जागे
नफरत के स्वर
दीवारें ऊँची करते
मन रोता है
सूखे पेड़ों पर
चिड़ियाँ लौट आतीं
आशा बचती है
झूठी दहशत
क्षण भर शोर मचाए
सत्य अडिग है
टूटे आँगन में
प्रेम की धूप उतरी
सन्नाटा पिघला
डरे हुए लोग
आँखों में प्रश्न लिए
राह खोजते हैं
आँधी के आगे
झुकना सीख न पाया
पुराना बरगद
कटु शब्दों से
रिश्तों की मिट्टी सूखी
मन बिखर गया
नई सुबह ने
घृणा के धुँए चीर
आकाश सजाया
मानवता फिर
धीरे हाथ बढ़ाती
प्रेम जीत गया
— डॉ. अशोक
