नौतपा : तप का ऋतु-विधान
जब सूर्य
रोहिणी नक्षत्र के प्रखर द्वार पर
अपने अग्नि-चरण रखता है,
धरती की देह पर
ताप का एक अदृश्य शास्त्र लिखना आरम्भ हो जाता है।
आकाश,
मानो अग्नि का दीर्घ उपवास धारण किए,
नीलेपन का समस्त सौम्य व्याकरण भूल जाता है।
हवाएँ थककर
अपने ही श्वासों के बोझ तले बैठ जाती हैं,
और वृक्ष—
छाँव होने के अपने धर्म में
मौन तपस्वी-से स्थिर दिखाई देते हैं।
नौतपा केवल मौसम नहीं,
यह प्रकृति की साधना का समय है;
जब धूप
धरती के धैर्य की परीक्षा लेती है,
और बीज
अँधेरे गर्भ में चुपचाप
अंकुरण की संभावनाएँ बुनते रहते हैं।
सूखी नदी का तल,
फटी हुई मिट्टी की रेखाएँ,
प्यासे पंछियों की काँपती चोंच—
सब मिलकर जैसे कहते हैं,
कि जीवन का सबसे कठिन अध्याय भी
अंततः सहनशीलता का ही व्याकरण रचता है।
ज्योतिष के प्राचीन आलोक में कहा गया—
जब सूर्य वृषभ राशि में
रोहिणी नक्षत्र के क्षेत्र में प्रवेश करता है,
तब यह नौ दिनों का ताप
धरती के संतुलन का एक अनिवार्य विधान बन जाता है।
मानो प्रकृति स्वयं
अग्नि से होकर
जल के उत्सव तक पहुँचने की साधना कर रही हो।
पर क्या केवल ऋतुएँ ही तपती हैं?
मनुष्य भी तो अपने भीतर
असंख्य नौतपा जीता है—
विरह का, संघर्ष का, प्रतीक्षा का,
अपूर्ण स्वप्नों और मौन पीड़ाओं का।
कितनी बार
जीवन की दुपहरियाँ इतनी झुलसा देती हैं
कि भीतर की नदी सूखने लगती है,
पर ठीक उसी समय
आत्मा के किसी गहन कोने में
आशा का एक बादल
धीरे-धीरे आकार लेने लगता है।
शायद इसीलिए
प्रकृति हर वर्ष नौतपा भेजती है—
यह स्मरण कराने कि
तपन दंड नहीं होती,
वह परिपक्वता का अनुष्ठान भी हो सकती है।
जो धूप में नहीं तपता,
वह वर्षा का वास्तविक अर्थ नहीं समझ पाता;
और जो पीड़ा में नहीं उतरता,
वह जीवन की हरियाली को
केवल दृश्य समझता है, अनुभव नहीं।
नौतपा यही कहता है—
हर दहकता हुआ समय
विनाश का संकेत नहीं होता;
कभी-कभी
झुलसती हुई धरती के भीतर ही
सावन अपना प्रथम स्वप्न बो रहा होता है।
— डॉ. अनिता जैन ‘विपुला’
