बेटियों के जल्लादों का हिसाब कब?
बेटियों के जल्लादों का हिसाब कब होगा,
ये सोई हुई व्यवस्था का जवाब कब होगा।
हर रोज़ कहीं मासूमियत कुचली जाती है,
इंसाफ़ की चौखट पर क्यों चुप्पी छाती है।
यूं आँखों में आँसू लिए माँ पूछ रही है अब,
इन दरिंदों पर कानून का प्रहार होगा कब।
क्या? ट्वीशा, क्या? दीपिका एवं अब अनु,
इन देश के लोभियों को कहाँ-कहाँ पे गिनु।
नारे तो बहुत गूँजते रहते चौक-चौराहों पर,
लेकिन क्यों? सन्नाटा है सत्ता की राहों पर।
कब जागेगी मानवता, यूं शर्मिंदा होगा मन,
बेटियों के जल्लादों को नसीब न हो कफ़न।
बेटी तो घर की रौशनी, जीवन का सम्मान,
उससे ही तो महकता है हर आँगन-जहान।
जो हाथ उठे बेटियों पे, वो हाथ झुकेंगे अब,
इन अत्याचारों का आखिर अंत होगा कब?
— संजय एम तराणेकर
