आखिर बेटियों को मौत क्यों?
आखिर बेटियों को मौत क्यों?
क्यों हर दिन किसी दिशा शर्मा की चिता जलती है?
क्यों किसी माँ की गोद सूनी होती है,
क्यों किसी पिता की आँखें उम्रभर रोती हैं?
क्यों शादी के बाद भी बेटियाँ सुरक्षित नहीं,
क्यों उनके सपनों की डोर इतनी कमजोर कर दी जाती है?
आखिर क्यों दहेज की आग में
आज भी बहुओं के अरमान जलाए जाते हैं?
क्यों रिश्तों के नाम पर अत्याचार होते हैं?
क्यों प्रेम, विश्वास और सम्मान की जगह
लोभ, क्रूरता और अहंकार पलते हैं?
एक बेटी जब जन्म लेती है,
तो घर में खुशियों का दीप जलता है।
वो पिता की मुस्कान होती है,
माँ की परछाईं होती है,
भाई की राखी का विश्वास होती है।
फिर वही बेटी विवाह के बाद
क्यों पराई कर दी जाती है?
क्यों उसके आँसुओं की आवाज
चार दीवारों में कैद रह जाती है?
क्यों समाज हर बार सवाल
बेटियों के चरित्र पर उठाता है,
लेकिन अत्याचारियों की मानसिकता पर नहीं?
क्यों हर बार समझौते की सीख
सिर्फ लड़कियों को दी जाती है?
क्यों उन्हें सहने की आदत सिखाई जाती है,
लड़ने की ताकत नहीं?
कब तक दहेज के भूखे लोग
इंसानियत का गला घोंटते रहेंगे?
कब तक किसी की बेटी
रसोई, कमरे या बंद दरवाजों में
अपनी चीखें दबाती रहेगी?
कब तक मौत को “आत्महत्या” कहकर
सच्चाई से मुँह मोड़ा जाएगा?
आखिर कब जागेगा समाज?
कब कानून का डर
दरिंदों के दिलों तक पहुँचेगा?
कब बेटियों को सिर्फ “सम्मान” के भाषण नहीं,
सुरक्षित जीवन मिलेगा?
भारत सिर्फ जाति और धर्म की बहसों में
कब तक उलझा रहेगा?
क्या प्रगति सिर्फ ऊँची इमारतों,
डिजिटल भारत और बड़ी-बड़ी योजनाओं से होगी?
या फिर उस दिन सच्ची प्रगति मानी जाएगी,
जब हर बेटी बिना डर के जी सकेगी?
कब तक हमारी बहनें
अपनी जिंदगी दाँव पर लगाती रहेंगी?
कब तक वे चुपचाप अत्याचार सहेंगी?
कब तक वे मौत के मुँह में धकेली जाती रहेंगी?
और कब तक समाज
मूकदर्शक बन तमाशा देखता रहेगा?
जरूरत है अब आवाज उठाने की,
जरूरत है बेटियों को कमजोर नहीं,
सशक्त बनाने की।
जरूरत है बेटों को यह सिखाने की
कि स्त्री कोई वस्तु नहीं,
वो भी एक इंसान है,
जिसके सपने, सम्मान और जीवन का अधिकार
उतना ही बड़ा है जितना किसी और का।
जिस दिन हर घर में
बेटी को बोझ नहीं, गौरव समझा जाएगा,
जिस दिन विवाह सौदा नहीं,
दो आत्माओं का सम्मानपूर्ण बंधन बनेगा,
उस दिन शायद
किसी दिशा शर्मा की मौत पर
यह प्रश्न नहीं उठेगा—
“आखिर बेटियों को मौत क्यों?”
— रूपेश कुमार
