हास्य व्यंग्य

महँगाई मैया की जय (व्यंग्य)

हमारे शास्त्रों में आठ चिरंजीवी बताए हैं-
अश्वत्थामा बलिरव्यासहनुमश्च विभीषण:।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविन:॥’
परशुराम, अश्वत्थामा, हनुमान, राजा बलि, वेद व्यास, विभीषण, कृपाचार्य और मार्कण्डेय। सनातन धर्म में मान्यता है कि प्रतिदिन सुबह इन आठों अमर पात्रों के नामों का स्मरण करने से मनुष्य निरोगी होता है और उसे लंबी आयु की प्राप्ति होती है। सब लिंग भेद की मानसिकता से ग्रसित थे। नारी को देवी बनाकर मंदिर में मूर्ति बनाकर तो बैठा दिया लेकिन किसी को अमरता की पदवी प्रदान नहीं की। क्या करें जिसकी लाठी, उसकी भैंस! सनातनियों ने ‘महँगाई-माता’ को नौवा ‘चिरंजीवी-रत्न’ का सम्मान न देकर घोर लिंगभेदी होने का अपराध किया है अपितु नारी समाज का अपमान किया है। यदि महँगाई को यह सम्मान तभी मिल जाता ना तो वर्तमान सनातनी सरकार का महिलाओं को लोकसभा में तैतीस प्रतिशतवाला फार्मूला सौ प्रतिशत मतों से जीत जाता। विरोधियों के मुँह पर ताले ही नहीं साहब फेविक्विक से भी अधिक मजबूत लोशन से चिपक जाते। उस युग में महँगाई रही ही न हो, यह मैं मान ही नहीं सकता। हमारे मनीषी इस अवतार को पहचान ही नहीं सके। जबकि महँगाई-माता शाश्वत है, चिरंजीवी है।
हे जगदंबा महँगाई-मैया! तुम्हें शत्-शत् नमन! तुम कलयुग में भी पालनहारी हो। जनता तुम्हारे बोझ से भले ही दब जाए पर मरती नहीं। इतनी जीवनदायिनी ऊर्जा तो मैंने कहीं नहीं देखी। तुम जिसमें प्रवेश कर जाओ उसे संजीवनी मिल जाती है। तुम जिस रूप में आओ, अखिल विश्व तुम्हारी आराधना करता है। तुम्हारे प्रताप से अनेक शासकों की चूलें हिल गईं। तुम ऐसी जमी कि कोई तुम्हारे पैर उखाड़ ना पाया। भारत में लोकतंत्र तुम्हारे कारण जीवित है पुष्पित और पल्लवित होता रहा है। हमारे राजनीतिज्ञ,अर्थशास्त्री मूर्ख हैं जो तुम्हें समूल नष्ट करना चाहते हैं। नासमझ ये नहीं जानते कि यदि तुम न रहो तो इनका भी अस्तित्व डायनासोर की तरह समाप्त हो जायेगा। मेरी तो सरकार को सलाह है कि देश के खेड़ो-देहात से लेकर महानगरों तक के प्रत्येक चौराहों पर तुम्हारी प्रतिमाएँ स्थापित करे। तुम्हारा महिमामंडन करनेवाले कवियों को विशेष रूप से सम्मानित करे। चित्रकार, मूर्तिकार और शिल्पकार इस सम्मान से वंचित रह जाएँगे बेचारे। अपनी कला में बाँधना इनके बस का नहीं।
इस संसार के किसी धर्म ने महँगाई का सम्मान नहीं किया। सब उसे कोसते रहे। डरावना और भयावह बताते रहे। राक्षसी, डायन , सूरसा जैसी संज्ञाओं को विशेषण बनाकर महँगाई को अपमानित करते रहे। महँगाई-भत्ता नाम से लक्ष्मी जी घरों में प्रवेश करती रहीं। पूजित होती रहीं। तुम्हारें हिस्से में क्या आया? तिरस्कार! अपमान!! बदनामी!!! कितना भयानक षड्यंत्र। देवी-देवताओं को यह सब शोभा नहीं देता।
लोग युद्ध को तुम्हारे विस्तार का कारण बताते हैं। जबकि तुम उस परिवार पर अधिक प्रसन्न रहती हो जहाँ तुम्हारे भक्तों की संख्या में साल-दर-साल वृद्धि होती रहती है। जहाँ तुम खुदा की देन और भगवान का प्रसाद समझ कर ग्रहण की जाती हो। ऐसी परजीवी आत्माएँ काक्रोच की तरह अंडे-पिल्ले तो पैदा करती हैं और बदनामी का सेहरा ‘महँगाई’ के सिर बाँध दिया जाता है। इससे बड़ी नाइंसाफी भला और क्या होगी?
इस बार तुमने फिर स्वरूप विस्तार किया है। हम कलयुगी, क्षुद्र और पापी लोग कुरुक्षेत्र में विराट-दर्शन नहीं कर सके थे। हमारे पास संजय की तरह दिव्य-चक्षु थे ना अर्जुन हो सकते हैं। हमने गीता में बस पढ़ा ही है कि यह संसार कृष्ण से जन्म लेकर कृष्ण में ही समा जाता है। आज तुमने अपने वह विराट-दर्शन करवा कर सिद्ध कर दिया है कि तुम शक्ति का अवतार हो, अजर ,अमर और चिरंजीवी हो। यह मानव समाज तुमसे पैदा होकर अंत में तुममें ही समा जाएगा। बोलो महँगाई मैया की जय!

— शरद सुनेरी

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