शिक्षा एवं व्यवसाय

एक ग्रीष्मकालीन पुनर्लेखन : छात्रावास, गर्मी और परी-नीट

“द अनफॉरगिविंग समर: कैसे भारत का ‘री-नीट’ संकट, अत्यधिक गर्मी की लहरों एवं भीड़भाड़ वाले हॉस्टलों के साथ मिलकर चल रहा है”

भारत में मेडिकल शिक्षा का सपना देखने वाले लाखों छात्रों के लिए नीट  केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदों का परिणाम होती है। लेकिन जब परीक्षा प्रणाली में खामियाँ सामने आती हैं और “री-नीट” की नौबत आती है, तब सबसे बड़ा बोझ उन्हीं छात्रों के कंधों पर आ पड़ता है, जिन्होंने ईमानदारी से अपनी तैयारी की होती है। इस वर्ष का री-नीट संकट केवल परीक्षा संबंधी विवाद नहीं है, बल्कि यह देश की भीषण गर्मी, छात्रावासों की बदहाल स्थिति और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक गंभीर सामाजिक मुद्दा बन गया है।

जून की तपती दोपहरों में, जब देश के अनेक हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच रहा है, लाखों छात्र एक बार फिर पुस्तकों और कोचिंग संस्थानों की ओर लौटने को मजबूर हैं। जिन छात्रों ने परीक्षा के बाद राहत की सांस ली थी, वे अब फिर से उसी तनावपूर्ण चक्र में फंस गए हैं। यह स्थिति केवल शैक्षणिक चुनौती नहीं, बल्कि धैर्य और सहनशक्ति की भी परीक्षा है।

री-नीट की घोषणा के बाद हजारों छात्रों को अपने घरों से वापस कोचिंग नगरों और छात्रावासों में लौटना पड़ा। कोटा, पटना, दिल्ली, लखनऊ और अन्य शिक्षा केंद्रों के हॉस्टल पहले से ही छात्रों से भरे हुए हैं। कई छात्रावासों में सीमित जगह, अपर्याप्त वेंटिलेशन और बुनियादी सुविधाओं की कमी एक सामान्य समस्या है। गर्मियों के मौसम में यह स्थिति और भी कठिन हो जाती है। छोटे-छोटे कमरों में कई छात्रों का रहना, बिजली कटौती, पानी की कमी और लगातार बढ़ती गर्मी उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

गर्मी की लहरें अब केवल असुविधा का विषय नहीं रह गई हैं; वे एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी हैं। लंबे समय तक अत्यधिक तापमान के संपर्क में रहने से थकान, निर्जलीकरण, चक्कर आना और हीट स्ट्रोक जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में परीक्षा केंद्रों तक पहुंचना, घंटों तक परीक्षा देना और फिर वापस लौटना छात्रों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन जाता है। यदि परीक्षा केंद्रों पर पर्याप्त पेयजल, शीतलन व्यवस्था और चिकित्सा सहायता उपलब्ध न हो, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

इस संकट का सबसे गहरा प्रभाव छात्रों की मानसिक स्थिति पर पड़ रहा है। एक बार परीक्षा देने के बाद अधिकांश छात्र मानसिक रूप से अगले चरण के लिए तैयार हो चुके थे। कुछ ने छुट्टियों की योजना बनाई थी, जबकि अन्य ने प्रवेश प्रक्रिया की प्रतीक्षा शुरू कर दी थी। अचानक पुनः परीक्षा की घोषणा ने उनकी योजनाओं को अस्त-व्यस्त कर दिया। कई छात्र निराशा, चिंता और असुरक्षा की भावना से जूझ रहे हैं। उन्हें यह महसूस होता है कि परीक्षा प्रणाली की कमियों का खामियाजा उन्हें अपनी मेहनत और मानसिक शांति के रूप में भुगतना पड़ रहा है।

री-नीट का यह विवाद भारतीय परीक्षा प्रणाली में विश्वास के संकट को भी उजागर करता है। जब राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो इसका प्रभाव केवल परिणामों तक सीमित नहीं रहता। यह छात्रों, अभिभावकों और समाज के उस भरोसे को भी प्रभावित करता है, जो शिक्षा व्यवस्था की नींव है। यदि छात्रों को यह विश्वास न रहे कि उनकी मेहनत का मूल्यांकन निष्पक्ष रूप से होगा, तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।

इस परिस्थिति में सरकार, परीक्षा एजेंसियों और शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। परीक्षा केंद्रों पर ठंडे पेयजल, छायादार प्रतीक्षालय, पर्याप्त वेंटिलेशन, चिकित्सा सुविधाएँ और सुरक्षित परिवहन व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही, भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए परीक्षा सुरक्षा और पारदर्शिता के उपायों को और अधिक मजबूत करना आवश्यक है।

“री-नीट” की यह कहानी केवल एक पुनर्परीक्षा की कहानी नहीं है। यह उन लाखों युवाओं की कहानी है जो भीषण गर्मी, भीड़भाड़ वाले छात्रावासों और अनिश्चित भविष्य के बीच भी अपने सपनों को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनकी दृढ़ता और धैर्य प्रेरणादायक है, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि देश उन्हें एक ऐसी परीक्षा प्रणाली प्रदान करे जो निष्पक्ष, विश्वसनीय और मानवीय हो।

आखिरकार, छात्रों से केवल परिश्रम की अपेक्षा नहीं की जा सकती; व्यवस्था से भी उतनी ही जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की अपेक्षा की जानी चाहिए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के सपनों पर टिका होता है, और उन सपनों को बार-बार परीक्षा में डालना किसी भी समाज के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

— डॉ. विजय गर्ग

*डॉ. विजय गर्ग

शैक्षिक स्तंभकार, मलोट

Leave a Reply