कुण्डली/छंद

चांदनी रात में, पिय के साथ में

गोरी घूंघट में हंसत, बदरी ओट मयंक
छत पर छतरी तानकर, बालम लगें निशंक
बालम लगें निशंक, अंक में रहि-रहि खींचें
निरखत रंक चकोर, रात्रिचर नयना सींचें
कह सुरेश कविराय प्राणप्रिय की वर जोरी
ना-ना करत धरत कर प्रियतम बरजत गोरी

— सुरेश मिश्र

सुरेश मिश्र

हास्य कवि मो. 09869141831, 09619872154