चांदनी रात में, पिय के साथ में
गोरी घूंघट में हंसत, बदरी ओट मयंक
छत पर छतरी तानकर, बालम लगें निशंक
बालम लगें निशंक, अंक में रहि-रहि खींचें
निरखत रंक चकोर, रात्रिचर नयना सींचें
कह सुरेश कविराय प्राणप्रिय की वर जोरी
ना-ना करत धरत कर प्रियतम बरजत गोरी
— सुरेश मिश्र
