तनहाई में एक रंग
खामोश सड़कों पर
टूटे हुए सपनों की परछाइयाँ
धीरे-धीरे चलती हैं
चाँद भी आज उदास है
रात की आँखों में
एक अनकहा दर्द है
हवा में कोई गीत नहीं
बस सूनी सांसों की
गूंज रह जाती है
दीवारें भी सुनती हैं
बीते हुए लम्हों की
टूटी हुई आवाज़ें
एक खिड़की के पास
रौशनी का छोटा सा टुकड़ा
अकेला सा कांपता है
समय ठहर सा गया है
घड़ी की सुइयाँ भी
थक कर सो गई हैं
मन के कोने में
एक अनदेखा रंग
धीरे से फैलता है
शायद वही रंग है
जो तनहाई में भी
जीवन को जीवित रखता है
— डॉ. अशोक
