भरोसा किस पर?
हर आत्मा का जन्म निश्चित है। हर आत्मा अपने पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार इस सृष्टि पर जन्म लेती है। वह उसी क्रम में एक मनुष्य जीवन आता है। हमारा जन्म से मृत्यु तक का जीवन एक किताब की तरह होता हैं। वह जिसका पहला पेज मनुष्य का जन्म सूचक होता है और इंसान की मृत्यु उसका अंतिम पृष्ट कहलाता है। हमको पहले और अंतिम पेज के बीच के पन्नों को अच्छे या बुरे कार्यों द्वारा अपने इस जीवनकाल में भरना ही होता है। हम अपने जीवन में दूसरों के साथ प्रामाणिक रूप से सही से बातचीत करके अपने आस-पास के लोगों में रहते है। वह उनको जानने का प्रयास करते है। यह कुल मिलाकर हमारे व्यक्तिगत विकास और पारस्परिक संबंधों के प्रति समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है तथा आत्म-सुधार, वास्तविक संबंध और पारस्परिक सम्मान आदि की वकालत करती है। अब प्रश्न आता हैं कि हम भरोसा किस पर करे ? हम भाषा पर बहुत भरोसा न करें। वह मन पर भी बहुत भरोसा न करें। हर आत्मा परमात्मा बनने में सक्षम हैं। कुछ लोग आतें और कहते हैं कि हमको आत्मा के बारें में बातचीत करनी हैं। वह कुछ आते हैं और कहते हैं कि आत्मा का दर्शन करना चाहते हैं। उनकी मैं यह बात सुनकर इसका बहुत सीधा उत्तर देता हूं की आत्मा को जानना चाहते हो या आत्मा के बारे में वाद- विवाद करना चाहते हों? वह इसके जवाब में कोई नहीं कहता की वाद- विवाद करना चाहता हूं। वह सब यही कहते हैं कि हम आत्मा को जानना चाहते हैं। वह अगर कोई आत्मा को जानना चाहता है तो पहले अपनी बात को छोड़े, ध्यान करें , मन को शांत करे, मौन करें , अंतर्मन मौन करें और शरीर को स्थिर करना सिखें और सिद्ध करना सिखें आदि – आदि। वह दरवाजे के पास जाओ। हमारा यह शरीर दरवाजा हैं। यह बड़ा विचित्र हैं कि तत्त्वज्ञानी लोग आत्मा के दरवाजे के पास जाना नहीं चाहते हैं। वे तो चाहते हैं कि हम बिल्कुल सीधे भीतर पहुंच जाएं। वह हमारी इसके लिए डाइरेक्ट अप्रोच होना चाहिए। वह हमारे कोई बिचौलिया नहीं होना चाहिए। हमको लक्ष्य प्राप्त करना है तो रास्ता को पार करना ही पड़ेगा। वह बीच के रास्ते भी हमको पार करने पड़ेंगे। वह सीधे कोई कैसे पहुंच जाएं। वे तो चाहते हैं सीधे पहुंच जाएं। भारतीय दर्शन का एक मौलिक सिद्धांत अनित्य का सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार यह संसार स्थायित्व से रहित है। हर चीज, हर स्थिति, परिस्थिति आदि – आदि पल- पल परिवर्तनशील हैं। वह जो आज है हुबहू कल नहीं थी। इसका साक्षात उदाहरण युग का परिवर्तन हैं तथा हर जीव-प्राणी का जीवन हैं। हमने यह मान लिया हैं कि आत्मा और परमात्मा की चर्चा करते हैं वे व्यक्ति और समूह आदि तत्त्वज्ञानी हैं और जो शरीर की चर्चा करता हैं वह तत्त्वज्ञान से परे चला जाता हैं। हमारा शरीर गंदा हैं हमको उसकी क्या चर्चा करनी हैं ? वह जो लोग मन, वचन और काया इन तीनों की साधना में लग जातें हैं वे आत्मा तक और परमात्मा तक भी पहुंच जातें हैं। वह इनकी साधना किए बिना जो लोग बातों में उलझ जातें हैं। उनको संसार समुद्र में अनंत काल तक भव – भ्रमण करने के बाद बीत जाने पर भी उन्हें न आत्मा मिलती हैं न परमात्मा मिलते हैं। वह संसार भ्रमण में उलझते ही चलें जाते हैं। वह उलझतें ही चलें जातें हैं। उन्हें कभी कोई रास्ता नहीं मिलता हैं। हम मानव की यह वृत्ति ऐसी होती हैं की हमारे जो सामने होता हैं उस पर हम ज्यादा ही ध्यान देते हैं। वह हम समग्रता की दृष्टि से विचार नहीं करते हैं। समग्र दृष्टि के बिना सम्यक् परिणाम भी नहीं होता हैं। आत्मा और परमात्मा के मार्ग में कोई तर्क-वितर्क नहीं होता हैं। वह केवल आत्मिक आस्था का ही सही मार्ग है। वह जिसके मन में आस्था नहीं उसे आराध्य की झलक भी नसीब नहीं होती हैं। वह आस्था के साथ-साथ प्रतीक्षा भी चाहिए क्योंकि उसे पाने की राह सीधी सपाट नहीं है। हमको इसके बंद कपाट खोल कर प्रवेश करना हैं। हमारी साधना जितनी गहन होगी उतना ही हमको कम समय लगेगा। वह जितना आसान सोचना और कहना है उतना आसान इसको पाना नहीं है। हमको इसके लिए कितने- कितने जन्म-जन्मांतर भी खपाना पड़ सकते हैं। हमारी पहले इसी राह पर जाना है कि यह रूचि तो सही से जगें। अतः हम स्वयं (आत्मा) पर ही स्वयं से भरोसा करें। यही हमारे लिए काम्य हैं।
— प्रदीप छाजेड़
