कविता

चाय

यह चाय जिंदगी की सुबह है 

सुबह सुबह न मिले 

तो लगता है दिन हुआ नहीं 

मेरा दिन इस चाय से है 

रात मेरी इसके स्वाद से है 

न मिले तो लगता है शरीर बेजान है 

इसकी हर चुस्की में एक नशा है 

कप का ओठों पे लगना 

इक एहसास देता है 

प्रेयसी के अधरों का अधरों से मिलन

*ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020