जीवन यापन की लागत।
घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमत में 29 रुपये की बढ़ोतरी के बाद विपक्ष ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) ने महंगाई को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर निशाना साधा है। 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की नई कीमत 7 जून से लागू हो गई है, जिसके बाद दिल्ली में इसकी कीमत 913 रुपये से बढ़कर 942 रुपये हो गई है। गैस सिलेंडर की कीमत बढ़ने के बाद कांग्रेस ने सबसे पहले केंद्र सरकार को घेरा। पार्टी ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर पोस्ट करते हुए लिखा, महंगाई मैन मोदी का चाबुक फिर चला है। अब घरेलू गैस सिलेंडर 29 रुपए महंगा कर दिया गया। मोदी का फंडा साफ है- जनता से वसूली करो, अमीर दोस्त की तिजोरी भरो। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि महंगाई का बोझ लगातार आम लोगों पर डाला जा रहा है।कांग्रेस ने रविवार को घरेलू गैस की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर मोदी सरकार पर तीखा हमला किया और पूछा कि बीजेपी नेता अब सिलेंडर लेकर सड़कों पर विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं, जबकि वे यूपीए सरकार के दौरान महंगाई पर शोर मचाते रहते थे।गौरतलब है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में पश्चिम एशिया संघर्ष के जवाब में 41 देशों में ईंधन के स्रोत होने के बड़े-बड़े दावे किए थे, उनका क्या हुआ?उन्होंने पूछा कि आज भी ग्रामीण इलाकों में एलपीजी की कमी क्यों है।कांग्रेस अध्यक्ष की यह टिप्पणी दिल्ली में 14.2 किलोग्राम के घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 913 रुपये से बढ़ाकर 942 रुपये करने के बाद आई है, जबकि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थी सालाना पहले चार रिफिल पर 300 रुपये प्रति रिफिल की सब्सिडी मिलने के बाद प्रभावी रूप से 642 रुपये प्रति सिलेंडर का भुगतान करते रह सकेंगे।खड़गे ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, घरेलू एलपीजी के दामों में आग की लपटें आम जनता की रसोई को भस्म करने पर तुली हुई हैं। मोदी सरकार ने पिछले 4 महीनों में घरेलू रसोई गैस सिलेंडर के दामों में 89 रुपये की बढ़ोतरी की है।समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर सरकार पर हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शायराना अंदाज में लिखा, रोटी के महंगे होने से थाली गई रूठ, बीजेपी से अब तो, हर आस गई टूट।अखिलेश ने अपने संदेश के जरिए बढ़ती महंगाई और आम लोगों की परेशानियों का मुद्दा उठाया।जून में हुई इस बढ़ोतरी के साथ बीते पांच महीनों में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में लगातार इजाफा हुआ है। फरवरी में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर 49 रुपये महंगा हुआ था, जबकि मार्च में इसके दाम में 115 रुपये की और बढ़ोतरी की गई थी।एलपीजी के अलावा सीएनजी की कीमतों में भी हाल के दिनों में वृद्धि दर्ज की गई है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में 15 मई से सीएनजी की दरों में चार अलग-अलग संशोधनों के जरिए कुल 6 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी की जा चुकी है। हाल ही में सीएनजी के दाम में 2 रुपये प्रति किलोग्राम की और वृद्धि की गई थी। ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच विपक्ष महंगाई के मुद्दे पर सरकार को लगातार घेर रहा है।गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई दर का अनुमान बढ़ाकर शुक्रवार को 5.1 प्रतिशत कर दिया। पहले इसके 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था। इसका मुख्य कारण ईंधन की बढ़ती कीमतों से कच्चे माल की लागत में बढ़ोतरी है।पेट्रोल की खुदरा कीमतों में मई से अब तक कुल 7.4 प्रतिशत और डीजल में 8.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।आरबीआई ने मौद्रिक नीति बयान में कहा कि इस बढ़ोतरी का कुल महंगाई पर करीब 0.36 प्रतिशत का सीधा असर पड़ेगा। इसके साथ दूसरे दौर के प्रभाव आने वाले महीनों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति में दिखाई देंगे।
इसमें कहा गया कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर वाणिज्यिक एलपीजी, औद्योगिक कच्चे माल, रसायन, रबड़ और प्लास्टिक उत्पादों जैसे अन्य कच्चे माल पर भी दिख रहा है। साथ ही, कच्चे माल की लागत बढ़ने के दूसरे चरण के प्रभाव आगे चलकर महंगाई पर दबाव डाल सकते हैं।आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने जून मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, जिंस कीमतों में झटके, मानसून को लेकर अनिश्चितता और अल नीनो जैसी परिस्थितियों के कारण महंगाई बढ़ने का जोखिम बना हुआ है।फरवरी में 3.2 प्रतिशत से थोड़ा बढ़ने के बावजूद मार्च और अप्रैल 2026 में कुल खुदरा महंगाई लक्ष्य से नीचे (क्रमशः 3.4 प्रतिशत और 3.5 प्रतिशत) रही।खाद्य महंगाई में कुछ बढ़ोतरी हुई, जबकि मार्च और अप्रैल में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहने से ईंधन की महंगाई दर नियंत्रित रही। मुख्य महंगाई मार्च-अप्रैल के दौरान 3.7 प्रतिशत पर स्थिर रही।कीमती धातुओं को छोड़कर मुख्य महंगाई इसी अवधि में और कम होकर 2.1-2.2 प्रतिशत रही।मल्होत्रा ने कहा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें (भारत पर भार) अप्रैल-मई, 2026 के दौरान औसतन लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल रही हैं। ऐसे संकेत हैं कि 2026-27 में औसत कीमतें पिछली नीति में अनुमानित स्तर से काफी अधिक रहेंगी।उन्होंने कहा कि ऊर्जा की ऊंची कीमतों और कई कच्चे माल की लागत में बढ़ोतरी के कारण अप्रैल, 2026 में थोक महंगाई (डब्ल्यूपीआई) में तेज उछाल देखा गया।तिमाही आधार पर खुदरा महंगाई का अनुमान पहली तिमाही में 4.2 प्रतिशत, दूसरी में 5.1 प्रतिशत, तीसरी में 5.9 प्रतिशत और चौथी में 5.4 प्रतिशत लगाया गया है। 2026-27 के लिए कुल महंगाई 4.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है।भारत की अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां आने वाले कुछ महीने करोड़ों भारतीय परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी को बदल सकते हैं. अब तक महंगाई को हम एक सामान्य आर्थिक समस्या मानते रहे हैं, लेकिन 2026 में भारत जिस स्थिति की ओर बढ़ रहा है, वह साधारण महंगाई नहीं, बल्कि चार मोर्चों पर बढ़ने वाला आर्थिक संकट है। पहला: कच्चे तेल की कीमतों में विस्फोटक वृद्धि। दूसरा: रुपये की तेज गिरावट. तीसरा: खाद्य तेलों की कीमतों में भारी उछाल।
और चौथा: कमजोर मानसून का खतरा। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसका मध्यम वर्ग पहले से ही भारी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है. ऐसे समय में यदि महंगाई और ब्याज दरें एक साथ बढ़ती हैं, तो यह भारतीय समाज की आर्थिक रीढ़ पर सीधा हमला होगा। भारत के लिए असली संकट केवल तेल महंगा होना नहीं है। असली संकट यह है कि तेल उस समय महंगा हो रहा है जब भारतीय रुपया भी कमजोर हो चुका है। अधिकांश लोग तेल की कीमत केवल डाॅलर में देखते हैं। उदाहरण के लिए यदि ब्रेंट क्रूड 70 डाॅलर प्रति बैरल से बढ़कर 110 डाॅलर प्रति बैरल हो जाए, तो पहली नजर में यह लगभग 57 प्रतिशत की वृद्धि दिखाई देती है। लेकिन भारत तेल डाॅलर में नहीं, रुपये में खरीदता है। इसलिए असली गणित कहीं अधिक खतरनाक है। मान लीजिए एक वर्ष पहले कच्चा तेल 70 डाॅलर प्रति बैरल था और डाॅलर का विनिमय दर 75 रुपये था। इसका मतलब भारत के लिए एक बैरल तेल की वास्तविक लागत हुई: 70 गुणा 75 = 5250 रुपये प्रति बैरल। अब वर्तमान स्थिति देखिए। यदि कच्चा तेल 110 डाॅलर प्रति बैरल पहुंच जाता है और उसी समय रुपया गिरकर 95 रुपये प्रति डाॅलर हो जाता है, तो भारत के लिए वास्तविक लागत होगी: 110 गुणा 95 = 10450 रुपये प्रति बैरल। अर्थात भारत के लिए तेल की वास्तविक लागत 5250 रुपये से बढ़कर 10450 रुपये हो जाती है। यानी लगभग 99 प्रतिशत की वृद्धि। यही वह बिंदु है जिसे अधिकांश लोग समझ नहीं पाते।पिछले एक वर्ष में रुपया डाॅलर के मुकाबले लगभग 11 प्रतिशत कमजोर हुआ है।इसका अर्थ है कि भारत के लिए हर आयातित वस्तु महंगी हो चुकी है।मोबाइल फोन, इलेक्ट्राॅनिक्स, मेडिकल उपकरण, औद्योगिक मशीनरी, रसायन, कंपोनेंट्स, यहां तक कि फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाली कई मशीनें भी आयातित हैं।रुपये की कमजोरी का असर केवल लग्जरी वस्तुओं तक सीमित नहीं रहता।धीरे धीरे यह रोजमर्रा की जिंदगी में घुस जाता है। उदाहरण के लिए यदि कोई मशीन 1000 डाॅलर की है, तो पहले उसकी कीमत 75000 रुपये थी।लेकिन यदि रुपया 95 प्रति डाॅलर तक गिर जाता है, तो वही मशीन 95000 रुपये की हो जाएगी। यानी बिना मशीन की अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़े भी भारतीय खरीदार के लिए लागत 20000 रुपये बढ़ गई।पिछले एक दशक में भारत का मध्यम वर्ग तेजी से कर्ज आधारित उपभोग माॅडल की ओर बढ़ा है। घर, कार, शिक्षा, मोबाइल फोन, छुट्टियां और रोजमर्रा का उपभोग अब ईएमआइ आधारित जीवनशैली का हिस्सा बन चुके हैं। भारत के मध्यम वर्ग के कर्ज का स्तर चिंताजनक हो चुका है। भारतीय मौसम विभाग ने एल नीनो प्रभाव के कारण सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई है। पहली नजर में 5 प्रतिशत कम बारिश कोई बड़ी बात नहीं लगती, लेकिन भारत जैसी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में यह बहुत गंभीर संकट बन सकता है। यदि बारिश कमजोर रही, तो फसल उत्पादन घटेगा और खाद्य महंगाई तेजी से बढ़ेगी।दालें, सब्जियां, दूध, अनाज और रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ महंगे होंगे आर्थिक आकलनों के अनुसार कमजोर मानसून उपभेक्ता महंगाई दर में 0.5 से 2 प्रतिशत तक अतिरिक्त बढ़ोतरी कर सकता है। भारत में खाद्य कीमतें केवल आर्थिक आंकड़े नहीं होतीं।वे राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक मनोविज्ञान से भी जुड़ी होती हैं। मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के बजट में भोजन सबसे बड़ा हिस्सा होता है।जब खाने का तेल महंगा होता है, तो उसका असर हर घर पर महसूस होता है। एक सिलेंडर की कीमत में लगभग 29 रुपये की वृद्धि हुई है, जो देखने में मामूली लगती है, लेकिन इससे उन परिवारों के मासिक खर्च बढ़ जाते हैं जिन्हें कई सिलेंडरों की आवश्यकता होती है। जब एक छोटा सा खर्च भी बढ़ता है तो जीवन यापन की लागत बढ़ जाती है।
— जुनैद मलिक अत्तारी
