बेईमान बहन-भाई और सौतेली मां का ज़ुल्म
वालिद साहब (पिताजी) के इंतक़ाल को अभी चंद ही महीने हुए थे कि घर की फज़ा (माहौल) बिल्कुल बदल गई। बड़ा बेटा, जो हमेशा से अपने वालिद का फ़रमाबरदार और पूरे ख़ानदान का सहारा था, अचानक अपने ही घर में अकेला और बेबस हो गया। वालिद की वफ़ात के बाद आमिर ने अपने दिल पर पत्थर रखकर अपने सारे फ़र्ज़ निभाए, जनाज़े के अख़राज़ात (ख़र्चों) से लेकर सौतेली मां और छोटे बहन-भाइयों के अख़राज़ात तक, उसने कभी किसी चीज में कमी नहीं आने दी।
लेकिन दूसरी तरफ़, सौतेली मां के दिल में कुछ और ही चल रहा था। आमिर के सगे बहन-भाई, जो अब तक उसके साए में पले-बढ़े थे, अपनी मां की बातों में आकर बेईमान हो चुके थे। इन सबकी नजरें अब सिर्फ़ वालिद की छोड़ी हुई जायदाद और कारोबार पर थीं।
सौतेली मां ने आहिस्ता-आहिस्ता आमिर के ख़िलाफ़ जाल बुनना शुरू कर दिया। वह हर वक़्त आमिर के छोटे बहन-भाइयों के कान भरती कि, दामादों के कहने पर, “अगर आमिर को उसका हिस्सा मिल गया, तो तुम लोगों के हाथ कुछ नहीं आएगा। यह तुम्हारा सगा भाई नहीं है, यह सब कुछ अकेला हड़पना चाहता है।”
आमिर को तो इस सच्चाई का इल्म (पता) भी न था कि वह इस घर का सगा नहीं बल्कि सौतेली मां का बड़ा बेटा है। मगर उसने तो मोहब्बत और फ़र्ज़ निभाने में कभी सौतेले और सगे का फ़र्क़ जाना ही नहीं था। वह दिन-रात मेहनत करके कारोबार को संभाल रहा था ताकि घर का चूल्हा जलता रहे। लेकिन साज़िशें इस हद तक बढ़ गईं कि आमिर को बताए बग़ैर बैंक अकाउंट्स और दुकान के कागज़ात अपने नाम करवाने की कोशिशें शुरू कर दी गईं, जहां आमिर दिन-रात अपना ख़ून-पसीना बहाता था।
घर के हर फ़ैसले से आमिर को दूर रखा जाने लगा। यहां तक कि रात के खाने पर भी उसे अकेला छोड़ दिया जाता। आमिर के सगे बहन-भाई जिन्हें उसने अपनी औलाद की तरह पाला था, अब उससे सीधे मुंह बात भी नहीं करते थे।
दामादों की मुनाफ़कत (मक्कारी) और झूठा तक़वा (परहेजगारी) दखल बढ़ता जा रहा था, इस पूरे घर को बर्बाद करने और आग लगाने में सबसे बड़ा हाथ बड़े दामाद का था, जिसकी मुनाफ़क़त की कोई हद न थी। वह शख़्स हज पर नहीं गया था, उसने जिंदगी में कभी हज का फ़रीज़ा अदा नहीं किया था, लेकिन मुआशरे (समाज) में अपनी झूठी इज़्ज़त बनाने के लिए वह ख़ुद को मस्जिदों में “हाजी साहब” कहलवाता था। सारा दिन नाकारा बैठकर दूसरों की कमाई पर पलने वाले इन दामादों का वाहिद (एकमात्र) काम दिन-रात घर में आग लगाना और सौतेली मां को आमिर के ख़िलाफ़ भड़काना था।
वह बड़ा दामाद पांच वक्त का नमाजी था, बाक़ायदगी से मस्जिद जाता, तहमत और टोपी पहनकर अपने तक़वे की नुमाइश (दिखावा) करता, लेकिन उसका दिल खौफ़-ए-ख़ुदा (ईश्वर के डर) से बिल्कुल ख़ाली था। उसे इस बात का ज़रा भी डर नहीं था कि वह जिस रब के सामने सजदा कर रहा है, वह उसके दिल के खोट और उसकी मकारियों से वाक़िफ है। वह नमाज़ें पढ़कर घर आता और आमिर के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना शुरू कर देता। सौतेली मां इस लालच और पट्टी में इतनी अंधी हो चुकी थी कि वह यह भी भूल गई कि बुढ़ापा सब पर आता है, और जिस बड़े बेटे को वह आज घर से निकाल रही है, कल वही उसका सच्चा सहारा बन सकता था।
फिर एक दिन सब्र और दरकिनार का लम्हा भी आही गया। एक शाम जब आमिर थका-हारा दुकान से लौटा, तो उसने देखा कि घर के बैठक में सौतेली मां और उसके बहन-भाई एक साथ बैठे कागज़ात पर दस्तख़त (हस्ताक्षर) कर रहे थे। जब आमिर ने अंदर जाकर पूछा कि यह सब क्या हो रहा है, तो सौतेली मां ने सर्द लहज़े में कहा- “तुम्हारे वालिद ने मरने से पहले ज़बानी वसीयत की थी कि यह घर और कारोबार सिर्फ़ मेरे बच्चों का होगा। तुम अब अपनी राह देखो, क्योंकि तुम्हारा इस घर पर कोई हक नहीं है। और सुनो, तुम मेरे सगे बेटे भी नहीं हो!”
आमिर के पैरों तले से ज़मीन निकल गई। यह इंकशाफ़ (ख़ुलासा) कि वह सौतेला है, उसे उतना नहीं तड़पा गया जितना अपनों की बेवफाई का दर्द तड़पा गया। उसने अपने भाइयों और बहनों की तरफ़ देखा, जिनके हुक़ूक़ के लिए उसने अपनी जवानी दांव पर लगा दी थी, लेकिन उन सबने अपनी नजरें झुका लीं। कोई एक भी आमिर के हक में न बोला, क्योंकि बेईमानी और लालच उनके दिलों में घर कर चुकी थी।
आमिर ने कोई झगड़ा नहीं किया, न ही कोई बददुआ दी। उसने आसमान की तरफ़ देखा, अपने मरहूम (स्वर्गीय) वालिद की रूह को याद किया जिसने उसे हमेशा डटकर जीना सिखाया था, और ख़ामोशी से अपना मुख़्तसर (छोटा सा) सामान समेटकर उस घर से निकल गया जिसे उसने अपने खून-पसीने से सींचा था।
घर से निकलने के बाद आमिर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह पढ़ा-लिखा और बासलाहियत (प्रतिभावान) था। उसने दिन-रात एक कर दिए, अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल-बूते पर उसने न सिर्फ़ बेपनाह नाम कमाया बल्कि बहुत सी जायदाद और दौलत भी बनाई। उसने अपने रब पर भरोसा रखा और एक पुरसुकून (शांत), इज्ज़तदार दुनिया बसा ली।
दूसरी तरफ़, उसके सौतेले भाई, दामाद और बहनें अपनी बेईमानी और नाअहलियत (नालायकी) की वजह से आहिस्ता-आहिस्ता मुफ़लिसी (ग़रीबी) के रास्ते पर आ गए। वह मक्कार दामाद जो ख़ुद को हाजी कहलवाता था, उसकी झूठी पारसाई (पवित्रता) उसके किसी काम न आई। कारोबार तबाह हो गया, घर का सुकून गारत (नष्ट) हो गया और बर्बादी उनका मुकद्दर बन गई। खुदा की लाठी बेआवाज थी, और उनका किया-धरा उनके सामने आ रहा था।
जब उन लोगों ने देखा कि आमिर बहुत अमीर हो चुका है, तो उनकी लालची नज़रें अब आमिर की ख़ुद से कमाई हुई दौलत पर पड़ीं। उन्होंने आमिर को कोर्ट से नोटिस भिजवा दिए, जिसमें यह झूठा दावा किया गया कि “आमर के पास जो यह दौलत और ज़ायदाद है, उसमें भी हमारा साझा हक़ बनता है।”
लेकिन अब आमिर वह पुराना, नर्म दिल आमिर नहीं रहा था जिसके जज्बात से कोई भी खेल जाए। जमाने की चालबाज़ियों और अपनों के धोखे ने अब उसे पत्थर बना दिया था। वह जानता था कि ये लोग मेरे बाप की औलाद जरूर हैं, लेकिन सरासर बेईमान और धोखेबाज हैं, और वह जिंदगी में दोबारा अब कोई धोखा नहीं खाना चाहता था। अदालत में जवाब दिया आमिर ने, क़ानून का सहारा लिया, अदालत के हर झूठे नोटिस का मज़बूती और सच्चई से जवाब दिया।
हक की जीत, चूंकि वह जायदाद आमिर ने अपनी खुद की मेहनत से बनाई थी और खानदानी जायदाद से उसका कोई लेना-देना नहीं था, इसलिए अदालत ने आमिर के हक में फैसला सुनाया और वह केस जीत गया।
केस जीतने के बाद, मुफ़लिसी और ज़िल्लत (अपमान) में डूबे हुए इन रिश्तेदारों ने आमिर की तरफ़ हसरत, उम्मीद और भीख़ भरी नज़रों से देखा। सौतेली मां की आंखों में पछतावा था और बहन-भाइयों के चेहरे पर शर्मिंदगी। लेकिन आमिर ने उनकी तरफ़ कोई निगाह नहीं की।
उसका दिल अब मोम नहीं हो सकता था, क्योंकि जब वह सड़क पर था तब किसी ने उसे गले नहीं लगाया था। उसने उनके लिए अपने दिल के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद कर दिए थे। वह समझ चुका था कि कुछ रिश्ते सिर्फ़ खून के होते हैं, एहसास के नहीं। उसने अपने रब का शुक्र अदा किया, जिसने उसे आज़माइश (परीक्षा) में सुर्ख़रू (सफ़ल) किया और मक्कारों को उनके अपने ही जाल में गिरा दिया। अब आमिर की ज़िंदगी में सुकून था, लेकिन एक ऐसा ख़ला (ख़ाली पन) भी था जो उसे हमेशा याद दिलाता था कि दुनिया में सबसे बड़ा धोखा अपने ही देते हैं।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’
