संघर्ष के रंग
सबके मन में दर्द है, सबकी अपनी पीर।
हँसते चेहरे ढाँपते, भीतर की तस्वीर॥
धूप मिली तो क्या हुआ, छाया भी है संग।
जीवन के हर मोड़ पर, चलते सुख-दुःख रंग॥
काँटों वाली राह में, चलते सारे लोग।
संघर्षों की आग से, मिटते मन के रोग॥
अपना-अपना बोझ है, अपनी-अपनी थाह।
चलना फिर भी पड़ रहा, जीवन की हर राह॥
किसको फुर्सत है यहाँ, किसको नहीं अभाव।
सबके हिस्से में लिखा, थोड़ा सुख, कुछ घाव॥
जीवन कोई फूल नहीं, केवल मधुर सुवास।
काँटों संग खिलता सदा, आशा का विश्वास॥
सबकी आँखें खोजतीं, खुशियों का इक छोर।
फिर भी चलते जा रहे, लेकर मन में भोर॥
अपने-अपने युद्ध हैं, अपने-अपने लोग।
संघर्षों के बीच ही, खिलते जीवन-योग॥
हर आँगन में धूप है, हर आँगन में छाँव।
जीवन के इस खेल में, किसको मिले न घाव॥
दुख की काली रात में, रखिए मन में धैर्य।
संघर्षों की भट्ठियों, तपो मिले ऐश्वर्य॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
