कहानी

बंदर-बांट (अफ़साना)

उस बड़े से पुश्तैनी ज़मीन की में अगर किसी का पसीना और त्याग छुपा था, तो वह सिर्फ़ बड़ा भाई था। पिता के जाने के  पहले भी और बाद भी, तीन भाइयों और तीन बहनों के इस भरे-पूरे कुनबे की क़श्ती को उसने अकेले अपने कंधों पर खेया था। लेकिन अफ़सोस किसी को कुछ भी याद नहीं रहा, उसके हिस्से की सुबह कभी आराम की नहीं रही। उसके भीतर अच्छे संस्कारों की एक ऐसी गहरी नदी बहती थी, जो अपनों की कड़वाहट को भी पी जाती थी। उसके लिए ‘फ़र्ज़’ कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक इबादत थी। उसने अपने तमाम फ़र्ज़ को बखूबी निभाया, लेकिन वक़्त गवाह है कि जब इंसान दूसरों के लिए ख़ुद को मोमबत्ती की तरह पिघलाता है, तो लोग अक्सर उसकी रोशनी का फ़ायदा तो उठाते हैं, पर उसके वजूद के खत्म होने की परवाह नहीं करते।

बड़े भाई की शादी के बाद, घर का माहौल अचानक बदलने लगा। जो भाई-बहन कल तक उसके साए में पले थे, आज उनकी आँखों में ज़हरीला लालच साफ़ दिखने लगा था। एक काली रात ऐसी आई जब साज़िशों की दीवारें इतनी ऊंची हो गईं कि बड़े भाई को अपनी ही मेहनत से सींचे गए घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। बेरुख़ी और बद-नीयती की हद तो यह थी कि विदा करते वक़्त उसे उसकी शादी का दहेज, यहाँ तक कि रोज़मर्रा की ज़रूरत का छोटा-मोटा सामान भी नहीं ले जाने दिया गया। वह भरी आँखों से अपनी शरीक-ए-हयात (पत्नी) का हाथ थामे, बिना कोई शिक़वा किए, सूनी सड़क पर आकर खड़ा हो गया। जेब ख़ाली थी, लेकिन सीने में  ख़ुद्दारी और पाकीज़ा नीयत का समंदर था।

उसने शहर के एक कोने में एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया। दिन को रात और रात को दिन किया। मलबे से इमारत खड़ी करने की ज़िद थी उसकी। उसने अपनी ईमानदारी और हलाल की कमाई से अपनी नई गृहस्थी का तिनका-तिनका जोड़ा। मुश्किल वक़्त था, पर उसने अपने बच्चों की आँखों में कभी बेबसी नहीं आने दी। तंग-दस्ती (ग़रीबी) के दिनों में भी उसने भूखे पेट रहकर बच्चों की पढ़ाई की फ़ीस भरी और उन्हें आला तालीम (उच्च शिक्षा) दिलवाई। वक़्त ने करवट बदली, बच्चे बड़े होकर ऊंचे ओहदों पर पहुंचे, और बड़े भाई के आंगन में बरकत और मान-सम्मान की बहार लौट आई।

इधर पुश्तैनी मकान में सन्नाटा था। जब माँ और बाकी भाई-बहनों ने देखा कि जिस बड़े भाई को उन्होंने रास्ते पर छोड़ दिया था, वह अपनी मेहनत से एक पुर-सुकून और आलीशान ज़िंदगी जी रहा है, तो उनके भीतर का सोया हुआ लालच फ़िर से करवटें लेने लगा। उन्होंने बड़े भाई के घर के चक्कर लगाने शुरू कर दिए। चेहरे पर पछतावे का झूठा मुखौटा था और ज़ुबान पर मक्कारी की मिठास।

बड़ा भाई तो पैदाइशी नर्म दिल का था। उसने अपनों के बदले हुए तेवरों के पीछे छिपी बदनीयत को भांपने के बजाय, उन्हें गले से लगा लिया। उसे लगा कि शायद अपनों का दिल पिघल गया है। लेकिन अफ़सोस, वे उसका हाल पूछने नहीं, बल्कि उसकी तरक़्क़ी से जलने और अपनी नई साज़िशों का ताना-बाना बुनने आए थे। उसकी इसी नर्म-दिली का उन्होंने बेहद बेरहमी से फ़ायदा उठाना शुरू कर दिया।

अब असली खेल शुरू हुआ पैतृक प्रॉपर्टी (पुश्तैनी ज़ायदाद) का। तीनों बहनों के पतियों (बहनोइयों) ने मिलकर एक ऐसी चाल चली, जिसमें उन्होंने छोटे भाइयों को मोहरा बनाया। उन्होंने छोटे भाइयों के कान भरे- “अगर बड़े भाई का दख़ल रहा, तो तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।” लालच अंधा होता है; छोटे भाई और यहाँ तक कि खुद माँ भी उन बहनोइयों के झांसे में आ गए।

ममता की मूरत कही जाने वाली माँ, जिसे इस मोड़ पर सबसे बड़ा इंसाफ़-पसंद होना चाहिए था, वह भी बड़े बेटे की बरसों की मख़लूस (सच्ची) मोहब्बत, उसकी कुर्बानियों और उस पर हुए ज़ुल्मों को भूलकर बेईमानी की राह पर चल पड़ी। सबने मिलकर कागज़ात तैयार करवाए और बड़े भाई को पुश्तैनी जायदाद से हमेशा के लिए बेदख़ल कर दिया। यहां तक कि उसकी खुद की  कमाई हुई प्रॉपर्टी ने भी हिस्सा मांगने लगे।

इसके बाद उस घर में वह ‘बंदर-बांट’ हुई जिसे देखकर इंसानियत का कफ़न भी कांप जाए। बहनोइयों ने अपनी मीठी बातों और मक़्क़ारी के जाल में माँ और छोटे भाइयों को ऐसा उलझाया कि धीरे-धीरे चालाकी से पूरी प्रॉपर्टी, दुकान, और ज़मीन सीधे अपने और अपनी पत्नियों (बहनों) के नाम करवा ली। छोटे भाई इस गुमान में ताली बजाते रहे कि बड़े भाई का पत्ता कट गया, पर वे यह नहीं समझ पाए कि वे ख़ुद उस डाल को काट रहे हैं जिस पर वे बैठे थे।

जब कागज़ी कार्रवाई पूरी हो गई, तो बहनोइयों ने अपने असली रंग दिखाए। उन्होंने छोटे भाइयों को दूध में से मख़्खी की तरह निकाल फेंका। छोटे भाइयों ने जब अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाई, तो उन्हीं बहनोइयों ने उन्हें धक्के मारकर बाहर कर दिया। जिस बड़े भाई से वे सालों तक लड़े, जिसके ख़िलाफ़ ज़हर उगला, आज उसकी अहमियत उन्हें समझ आ रही थी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। वे अपने ही लालच की आग में जलकर उस ‘बंदर-बांट’ का शिकार हो चुके थे और अब पूरी तरह ख़ाली हाथ, सड़क पर थे। माँ, जिसने अपने बड़े बेटे से दग़ा किया था, आज उसी की बेटियाँ और बहनोई सारी प्रॉपर्टी हथियाकर मालिक बन बैठे थे और माँ एक कोने में बैठकर अपनी बेबसी पर आंसू बहा रही थी।

इस पूरे शोर-शराबे और तमाशे से कोसों दूर, बड़ा भाई शाम के वक़्त अपने आलीशान मकान के बगीचे में बैठा था, वो कर भी क्या  सकता था, मगर वो ख़ुश था,उसके पास उसके संस्कारी बच्चे थे, पत्नी का अटूट साथ था और सबसे बड़ी बात, उसके सीने में एक साफ़ और बेदाग दिल था। उसे पुश्तैनी बंटवारे के खोने का कोई मलाल नहीं था।

उसने डूबते हुए सूरज को देखा और गहरी सांस लेकर मन ही मन कहा,“ईंट-पत्थरों के मकान, ज़मीन के टुकड़े और तिजोरियाँ तो छल-कपट से जीती जा सकती हैं और बांटी जा सकती हैं… पर दिल का सुकून, मुक़द्दर की तहरीर और नीयत की बरक़त को कोई कैसे बांट सकता है?”

रिश्तों की बेईमानी ने उन सबको दुनिया की नज़र में अमीर तो बना दिया था, पर अंदर की रूह से वे हमेशा के लिए कंगाल हो चुके थे। वहीं बड़ा भाई अपनी खुद की कमाई और सन्तुष्टि के साम्राज्य का बेताज बादशाह था।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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