एक अनकही जंग : युद्ध की विशेषता और उसके दुष्परिणाम
सृष्टि के आरंभ से ही संघर्ष जीवन का अभिन्न सत्य रहा है। जहाँ सृजन है, वहाँ संरक्षण का प्रयत्न है; जहाँ संरक्षण है, वहाँ प्रतिरोध भी है। किंतु जब यही प्रतिरोध विवेक की मर्यादाएँ लाँघकर विनाश का पर्याय बन जाता है, तब वह युद्ध कहलाता है। युद्ध केवल सीमाओं पर लड़ी जाने वाली रक्तरंजित मुठभेड़ नहीं, बल्कि वह एक ऐसी मानसिक, सामाजिक और नैतिक स्थिति है, जो मानव-सभ्यता की जड़ों तक को झकझोर देती है। अनेक बार इसकी कोई औपचारिक घोषणा नहीं होती, कोई रणभेरी नहीं बजती, कोई सैनिक वर्दी नहीं पहनता; फिर भी एक मौन संघर्ष निरंतर चलता रहता है। यही “अनकही जंग” है—जो कभी राष्ट्रों के मध्य, तो कभी मनुष्य के अंतर्मन में अनवरत धधकती रहती है।
युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता उसका असीम विस्तार है। वह कभी किसी सीमा-रेखा में आबद्ध नहीं रहता। प्रारंभ भले ही स्वाभिमान, सुरक्षा अथवा न्याय की स्थापना के उद्देश्य से हो, किंतु कालांतर में उसका स्वरूप इतना विकराल हो उठता है कि वह अपने औचित्य को ही निगल जाता है। उसके प्रहार केवल धरती पर नहीं पड़ते, वे मनुष्य की चेतना, संवेदना और संस्कृति को भी विदीर्ण कर देते हैं। युद्ध की जड़ में प्रायः अहंकार, भय, असुरक्षा, वर्चस्व की लालसा और संवादहीनता का विष छिपा होता है।
युद्ध का दूसरा स्वरूप उससे भी अधिक भयावह है—उसकी अमानवीयता। युद्ध मनुष्य से उसका मनुष्यत्व छीन लेता है। वहाँ करुणा का स्थान क्रूरता ले लेती है, संवेदना शुष्क हो जाती है और जीवन का मूल्य आँकड़ों में सिमट जाता है। विजेता और पराजित दोनों ही अंततः क्षति के भागी बनते हैं, क्योंकि युद्ध में पराजित केवल कोई राष्ट्र नहीं होता—पराजित होती है समूची मानवता।
युद्ध का प्रथम और सबसे मार्मिक दुष्परिणाम मानव जीवन पर पड़ता है। असंख्य निर्दोष जन अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं। जो जीवित रह जाते हैं, वे स्मृतियों के ऐसे घाव लेकर जीवन बिताते हैं, जिन्हें समय भी पूर्णतः भर नहीं पाता। युद्ध केवल शरीर को घायल नहीं करता, वह मन को भी स्थायी रूप से आहत कर देता है। भय, विस्थापन, असुरक्षा, अवसाद और पीड़ा की विरासत पीढ़ियों तक स्थानांतरित होती रहती है।
सामाजिक स्तर पर युद्ध विश्वास की नींव को चूर-चूर कर देता है। परिवार बिखर जाते हैं, संबंधों की ऊष्मा शीतल पड़ जाती है और समाज में सहयोग के स्थान पर संदेह तथा घृणा का विष फैलने लगता है। सभ्यताओं का सांस्कृतिक वैभव, जो शताब्दियों की साधना से निर्मित होता है, कुछ ही क्षणों में धूल में मिल जाता है।
आर्थिक दृष्टि से युद्ध विकास की धारा को अवरुद्ध कर देता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और आधारभूत संरचनाएँ विनष्ट होने लगती हैं। राष्ट्र अपनी ऊर्जा सृजन के स्थान पर विनाश में व्यय करने लगता है और उसका दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों तक को भुगतना पड़ता है।
परंतु युद्ध का एक और स्वरूप है, जो कहीं अधिक सूक्ष्म, मौन और गहन है—मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाली अनकही जंग। इस युद्ध की कोई रणभूमि नहीं होती, कोई शस्त्र नहीं होता, कोई दर्शक नहीं होता; फिर भी इसकी वेदना सर्वाधिक तीव्र होती है। यह संघर्ष तब जन्म लेता है, जब आशा और निराशा, विश्वास और संशय, साहस और भय, कर्तव्य और मोह एक-दूसरे के सम्मुख खड़े हो जाते हैं।
जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते हैं, जब मनुष्य बाहर से शांत दिखाई देता है, किंतु भीतर उसका अस्तित्व निरंतर टूटता और पुनः जुड़ता रहता है। उसकी मुस्कान के पीछे अनगिनत पीड़ाएँ, उसकी सफलता के पीछे असंख्य असफलताओं की राख और उसके आत्मविश्वास के पीछे अनवरत आत्मसंघर्ष छिपा होता है। इस युद्ध में मनुष्य स्वयं ही योद्धा होता है, स्वयं ही रणभूमि और स्वयं ही अपना पथ-प्रदर्शक।
यही वह क्षण है जहाँ धैर्य उसका कवच बनता है, आत्मविश्वास उसका अस्त्र और आत्मस्वीकृति उसकी विजय-पताका। जो व्यक्ति अपने भीतर के भय, मोह, क्रोध और निराशा पर विजय प्राप्त कर लेता है, उसके लिए संसार का कोई भी बाह्य संघर्ष असाध्य नहीं रह जाता। वस्तुतः आत्मविजय ही समस्त विजयों का मूल है।
आज का विश्व जिस प्रकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संघर्षों से घिरा हुआ है, वहाँ शांति केवल राजनीतिक संधियों से स्थापित नहीं हो सकती। उसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने भीतर करुणा, सहिष्णुता, संवाद और सह-अस्तित्व के संस्कारों का पुनर्जागरण करे। जब तक मनुष्य अपने अंतर्मन की हिंसा को परास्त नहीं करेगा, तब तक बाहरी युद्धों का अंत भी संभव नहीं होगा।
अंततः यही निष्कर्ष उभरकर सामने आता है कि युद्ध कभी समाधान नहीं होता; वह केवल समस्याओं के विस्तार का माध्यम बनता है। चाहे वह सीमाओं पर लड़ा जाने वाला भीषण संघर्ष हो अथवा अंतर्मन में चलने वाली मौन जंग—दोनों का अंतिम परिणाम पीड़ा ही है। इसलिए मानवता की वास्तविक विजय शस्त्रों की चमक में नहीं, बल्कि शांति की
शीतल आभा में निहित है; वर्चस्व में नहीं, सह-अस्तित्व में है; और किसी दूसरे को पराजित करने में नहीं, स्वयं के भीतर की हिंसा पर विजय प्राप्त करने में है। यही “अनकही जंग” का शाश्वत संदेश है, यही जीवन का परम सत्य।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
