लघुकथा

त्याग की अंतिम कीमत

मेरे पिताजी छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने उम्र से पहले जिम्मेदारियों का भारी बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था। हमारे संयुक्त परिवार की आजीविका कपड़े की दुकान पर निर्भर थी, जिससे सभी की पढ़ाई, इलाज और विवाह जैसे खर्च पूरे होते थे।

समय के साथ दो चाचा सरकारी सेवा और बीमा क्षेत्र में स्थिर हो गए, फिर भी परिवार की आर्थिक धुरी वही दुकान बनी रही। पिताजी का विश्वास था—“परिवार एक है”, इसलिए वे सबको साथ लेकर बिना भेदभाव चलते रहे।

महंगाई और बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने एक व्यावहारिक निर्णय लिया कि जो कमाता है, वह अपने व्यक्तिगत खर्च स्वयं उठाए, ताकि व्यवस्था संतुलित रहे। पर यह कदम धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी का कारण बन गया और अपनापन हिसाब-किताब में बदलने लगा।

फिर भी हर जरूरत दुकान की कमाई से पूरी होती रही, पर पिताजी भीतर ही टूटते चले गए। वे मौन रहकर सब सहते रहे—अपनापन और कठोर शब्द दोनों। तनाव उन्हें धीरे-धीरे तोड़ता गया। एक दिन वही बोझ उन्हें सदा की खामोशी में ले गया। वे चले गए, पर घर में गूंजता सन्नाटा छोड़ गए।

मैं, उनकी सबसे छोटी बेटी, आज समझ पाई हूँ कि कभी-कभी परिवार को जोड़ने की कीमत एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी से चुकाता है। दुकान आज भी चलती है, पर जिसने सबको संभाला, उसे कोई नहीं पूछता।

उनकी जिंदगी सिखा गई कि परिवार को जोड़ने वाला ही नहीं, जिम्मेदारियों को बाँटने वाला भी चाहिए, वरना सबसे मजबूत इंसान भी टूट जाता है।

— कृति आरके जैन

कृति आरके जैन

बड़वानी (मप्र) संपर्क: 79992 40375 ईमेल: kratijainemail@gmail.com

Leave a Reply