कविता

हे नवांकुरो

हे नवांकुरो!
घबड़ाना मत
लिखते रहना
कलम को मजबूत रखना
मत डरना आलोचनाओं से

सच लिखना तुम
एक दिन तुम भी
आग की भट्टी से
पककर निकलोगे

तब तुम्हारी रचनायें
परिपक्व हो होंगी

यह आसमां तुम्हारा होगा
तुम भी अंकित हो जाओगे
इतिहास के पन्नों में

तब तुम खुशबू बनकर
पूरे क्षितिज तक
तुम ही तुम होगे

— जयचन्द प्रजापति “जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com

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