कविता

चढ़ावा चोरी

राम भक्ति का ओढ़ के चोला,
कड़वा विष विश्वास में घोला,
कितने चेहरे पाखंडी हैं,
गुरु हो या चेला,
मिलकर खेल रहे ये,
राम के घर में गंदा खेला।

ना इनको चिंता ना फिकर,
निर्भय फिरते ये निडर,
सत्ता सदा धनवान के कर,
चोर बसे भगवान के घर।

गुरु-घंटाल बने हैं ज्ञानी,
करते रहते हैं मनमानी,
जो जितना बड़ा चोर है,
उतना ही रक्तखोर है।

नाम मसीहा खुद का धरते,
काम कसाई का हैं करते,
नहीं भगवान से ये डरते,
खुद को खुदा ये समझते।

सुनते आए हैं हम, नेकी पर रहो -भगवान से डरो,
हम तो डर के रह लेंगे,
पर, इनका भी तो कोई कुछ करो।

ये कैसे वनवासी हैं?
सत्ता जिनकी दासी है,
कैसे इनके पाप धुलेंगे,
क्या, सरयू जल में जाय मरेंगे ?

— पुखराज छाजेड़

Leave a Reply