मौन की ढाल
रिश्ते यदि हों घाव बन, बढ़े निरंतर पीर।
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
मन के भीतर टूटते, कितने मौन विहार।
अपने ही जब दे गए, विश्वासों पर वार॥
शब्द नहीं उपचार तब, चुप ही बने समीर—
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
हर उत्तर आवश्यक नहीं, हर झगड़ा नहीं जीत।
कुछ रिश्तों की हार में, छिपी हुई है प्रीत॥
दूरी भी उपचार है, जब बढ़ जाए पीर—
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
मीठे मुख के सामने, मन में यदि हो छेद।
ऐसे झूठे स्नेह से, अच्छा निर्मम भेद॥
सच की रक्षा कर सके, वही बने गंभीर—
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
क्षमा हृदय की शक्ति है, भूल नहीं हर बार।
स्वाभिमान के सामने, झुकता नहीं विचार॥
आत्मसम्मान के बिना, जीवन रहे अधीर—
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
‘सौरभ’ रिश्ते प्रेम से, पाते सदा विस्तार।
छल-कपट की धूप में, मुरझाते व्यवहार॥
जब सम्मान न बच सके, छोड़ो वह जागीर—
रिश्ते यदि हों घाव बन, बढ़े निरंतर पीर।
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
