धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

स्वामी विवेकानंद का ‘शून्य‘

वर्तमान वर्तुलाकार शून्य की खोज 5 वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने की थी। इस शून्य से संबंधित स्वामी विवेकानंद का शिकागो प्रवचन का प्रसंग अत्यंत गौरवपूर्ण एवं प्रेरणादायी है। 

11 सितंबर, 1893 को शिकागो में कोलम्बस के द्वारा अमेरिका की खोज की 400 वीं वर्षगांठ मनाने के उपलक्ष्य में ‘विश्व धर्म संसद‘ आयोजित की गई थी। उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप में स्वामी विवेकानंद को भी सम्मिलित होने का अवसर मिला। कार्यक्रम में विज्ञान के द्वारा संसार में जो उन्नति हुई, उसको सामने रखना था। सभी धर्मों की वृहद व्याख्या विद्वानों – धर्माचार्यों द्वारा की गई और अंत में दर्शाया गया कि ईसाई धर्म ने ही मानवता की सबसे अधिक सेवा की है। विवेकानंद को भी अंत में सभा को संबोधित करने के लिए कहा गया। भारत के विचित्र वेशभूषा वाले भगवावस्त्रधारी स्वामी विवेकानंद को देखकर श्रोताओं ने उन्हें उपहास का पात्र समझा और उन्हें बोलने का विषय शून्य (0) अर्थात ‘कोई विषय नहीं ‘दिया गया और समय केवल एक मिनट। विवेकानंद ने  ‘अमेरिका के मेरे भाइयों और बहिनों! कहते हुए शून्य विषय को संपूर्ण ब्रह्मांड और भौगोलिक दृष्टिकोण के सापेक्ष शून्य को सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण बताया। ऐसे आकर्षक वक्तव्य को सुनकर लोग मंत्रमुग्ध थे। बार – बार श्रोताओं की तालियों की गड़गड़ाहट गूँज रही थी। श्रोताओं की ओर से क्रमशः समय बढ़ाने की आवाज आ रही थी। भीड़ प्रतिदिन बढ़ती गयी और शून्य विषय को लेकर स्वामी जी ने शिकागो धर्म सम्मेलन में 18 दिनों तक प्रवचन किया, फिर भी शून्य – मानव धर्म का पूर्ण विवेचन नहीं हो सका। उन्होंने युवा वर्ग के लिए कहा – ‘उठो, जागो और जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो जाए, रुको मत। ‘ उन्होंने शून्य के माध्यम से धार्मिक एकता और अद्वैतवाद से हिन्दू धर्म की श्रेष्ठता को प्रतिपादित किया तथा सर्वधर्म समभाव जाग्रत करते हुए विश्व में हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। 

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र 

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

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