कविता

जाति जाती नहीं

कितनी सदियाँ बीत गईं, पर घाव अभी भी ताज़ा है,
इंसान से पहले यहाँ अक्सर उसका जाति पूछा जाता है।
बराबरी की बातें मंचों पर खूब सुनाई देती हैं,
धरातल पर मगर ऊँच-नीच की दीवारों की खेती हैं।

जिसे अधिकार मिला, उसने अधिकार ही बाँट दिए,
कुछ हाथों में सम्मान, कुछ में अपमान छांट दिए।
छोटी-सी बात पर वैर की आग भड़क उठती है,
नफ़रत की फसल हर मौसम में कड़क उठती है।

जो अन्याय सहता है, उसी से सबूत माँगे जाते हैं,
सच बोलने वालों पर ही प्रश्नचिह्न टांगे जाते हैं।
गाँव की चौपालों से लेकर शहरों की गलियों तक,
भेदभाव के किस्से अब भी चलते हैं पीढ़ियों तक।

कानून की किताबें समता का संदेश सुनाती हैं,
लेकिन संकीर्ण सोच कई बार राह रोक जाती है।
जब तक मन से भेदभाव का अँधेरा नहीं मिटेगा,
तब तक हर नया सवेरा अधूरा ही दिखेगा।

आओ ऐसा भारत मिलकर तैयार करें,
जहाँ मनुष्य का मूल्य उसके कर्म से स्वीकार करें।
जाति नहीं, इंसानियत ही पहचान बन जाए,
संविधान का सपना हर जन का सम्मान बन जाए।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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