कविता

पावस

पावस आएँ मन हरषाएँ।
धरती चादर हरित बिछाएँ।।
नभ में काले बादल छाए।
नाचे मोर पपीहा गाए।।

बूंदन की झर लगती न्यारी।
भीगें बाग-बगीची सारी।।
ताल-तलैया भर जल आए।
कृषक लिए हल खेत सजाए।।

चपला चमके घन गहराए।
मंद-मंद पुरवाई आए।।
टप-टप पत्तन पर जल बरसे।
दादुर मोर शोर कर हरषे।।

तन ठंडी बयार छू जाए।
मन में नव उमंग हर्षाए।।
पावस सबको जीवन दाता।
धरती का ये भाग्य विधाता।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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