औकात,अहंकार का भ्रम या चरित्र का दर्पण?
“औकात” शब्द का अर्थ अक्सर लोग धन-दौलत, पदवी या पारिवारिक विरासत तक सीमित मान लेते हैं, जिसके अहंकार में वे दूसरों को नीचा दिखाने या उनकी गरिमा को कमतर आंकने की भूल कर बैठते हैं, लेकिन वास्तव में ‘औक़ात’ का मापदंड किसी व्यक्ति के बैंक बैलेंस या रूतबे में नहीं, बल्कि उसके चरित्र की गहराई, संस्कारों की पुख्ता नींव और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार में निहित होता है। एक ख़ानदानी और सभ्य इंसान की पहचान इस बात से होती है कि वह विपरीत परिस्थितियों और सामने वाले व्यक्ति की सामाजिक स्थिति के बावजूद अपनी शालीनता, सहानुभूति और विनम्रता को कैसे बनाए रखता है, क्योंकि असली औक़ात वह अर्जित की हुई पूंजी है जो व्यक्ति अपने हर दिन के मानवीय आचरण, क्षमाशीलता और नैतिकता के माध्यम से कमाता है। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे को उसकी औक़ात का एहसास दिलाने का प्रयास करता है, तो वह वास्तव में अपनी ही संकीर्ण मानसिकता, अहंकारी दृष्टिकोण और संस्कारों के खोख़लेपन को उजागर कर रहा होता है, क्योंकि सच्चा बड़प्पन दूसरों को छोटा साबित करने में नहीं, बल्कि स्वयं को इतना ऊंचा उठाने में है कि आपकी उपस्थिति मात्र से सामने वाला सम्मान का अनुभव करे। पद, अधिकार और भौतिक साधन समय के साथ बदल सकते हैं या नष्ट हो सकते हैं, लेकिन एक व्यक्ति का व्यक्तित्व, उसकी कथनी-करनी की समानता और उसकी उदारता ही वह शाश्वत पैमाना है जो यह सिद्ध करता है कि समाज में वास्तव में किस व्यक्ति का कद और ‘औक़ात’ कितनी ऊंची है, और यही वह सत्य है जो केवल परिपक्व, सहृदय और सच्चे अर्थों में संस्कारी लोगों की महफ़िल में ही समझा जा सकता है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
