कविता

खरबूजा रंग बदलता है

कौन कहता है कि संगति का असर
हम पर कदापि नही पड़ता है
सच तो यही है खरबूजे को देखकर
खरबूजा रंग बदलता है ।।

हर तरफ फैली है बस नकारात्मकता
हिंसा, प्रति हिंसा और स्वार्थपरकता
सनसनी फैलाने के चक्कर में
दूर होती जा रही कर्तव्य परायणता

मिले गर जो सही राह दिखाने वाला
सम्पूर्ण काया- कल्प कर सकता है
सच तो यही है खरबूजे को देखकर
खरबूजा रंग बदलता है ।।

आस पास हो रही सब घटनाएं
हमको प्रभावित करती ही हैं
कोई चाहे या फिर न चाहे
अशान्ति अन्ततः अखरती ही है।

वातावरण सम्पूर्ण दूषित हो जाता
और भय का भाव उभरता है
सच तो यही है खरबूजे को देखकर
खरबूजा रंग बदलता है।।

सकारात्मकता का जब होता हनन
दूर होता जाता फिर वह अपनापन
बुराई की तरफ कदम होते अग्रसर
खुद हम कर लेते फिर अपना पतन।

पाकर सत्संगी व्यक्तित्व का सानिध्य
आनंद भाव दिल में फिर उभरता है
सच तो यही है खरबूजे को देखकर
खरबूजा रंग बदलता है ।।

जैसे लोगों संग होगी अपनी बैठकी
वैसे ही विचार मन में उतर जाएंगे
जब तक इच्छा शक्ति प्रबल न हो
खुद आप उनके रंग में रंग जाएंगे ।

पता न चलेगा कब बदल गये हम
जीवन का सफर यूं ही चलता है
सच तो यही है खरबूजे को देखकर
खरबूजा रंग बदलता है।।

खूबसूरत विचारों से मन को सजाएं
अपने आसपास की दुनिया महकाएं
निज स्वार्थ में ही न डूबे रहकर
गर हो सके तो दूसरों के काम आएं।

बहुत मुश्किल से मिला यह मानव तन
जैसा आप सोच लो यह वैसे ढलता है
सच तो यही है खरबूजे को देखकर
खरबूजा रंग बदलता है।।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई