कविता

शायद

दुनिया के जंगल में
खो चुका है जो कुछ
ब्रम्हांड उसे
कभी
कहीं
किसी जगह
किसी वक्त
लौटाने का
वादा करता भी है क्या ??
शायद नहीं ….
प्रकृति के लिये किसी निर्दोष या दोषी में फर्क नहीं होता है।
शायद ….
भले के साथ भला ,
सब्र का फल मीठा ,
न्याय- अन्याय और
कर्म फल का ये सभी सिद्धांत
इंसान के मन से उपजे मात्र सांत्वना भाव है बस ..
शायद …।

— साधना सिंह

साधना सिंह

मै साधना सिंह, युपी के एक शहर गोरखपुर से हु । लिखने का शौक कॉलेज से ही था । मै किसी भी विधा से अनभिज्ञ हु बस अपने एहसास कागज पर उतार देती हु । कुछ पंक्तियो मे - छंदमुक्त हो या छंदबध मुझे क्या पता ये पंक्तिया बस एहसास है तुम्हारे होने का तुम्हे खोने का कोई एहसास जब जेहन मे संवरता है वही शब्द बन कर कागज पर निखरता है । धन्यवाद :)