निज दूषन गुन राम के
“निज दूषन गुन राम के, समुझें तुलसीदास।
होइ भलो कलिकालहूँ, उभय लोक अनयास॥”
मनुष्य अपने अंदर की कमियों को स्वीकार कर उनमें सुधार करे और प्रभु श्रीराम के महान गुणों का स्मरण व चिंतन कर उनका वरण करे, तो इस कलयुग में भी उसका वर्तमान और आने वाला जीवन दोनों बिना किसी कठिन प्रयास या बाधा के सहज ही सुधर जाते हैं।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
